श्रीमद भगवद्गीता मेरे विचार संकलित

Gitaji

આજ સુધી હિન્દીમાં ગીતા અધ્યાય મારી સમજ પ્રમાણે લખ્યા ,7, દિવસ તે સંકલિત કરી અત્રે મુકું છું.
Below is my understanding of srimad Bhagavadgita ,written in hindi. Some shlokas interpretation I had shared earlier.
My logical understanding is based on context ,which is Mahabharat Yuddh between Two Kings and their Sena.
Where it is certain that many bodies will loose their lives.
आजसे मारकंदभाई के घरमे श्रीमद भगवद गीताका पाठ होगा ,वैसे हरेक समय सुखदुःखमे गीताजी मार्गदर्शिका है।
पहले ही ,अर्जुनके द्विधापूर्ण वक्तव्यके बाद ही, दूसरे अद्याय से श्रीकृष्ण उपदेश देते है.
आप अपना शरीर, जिस को देहि कहाजाता है ,उसके जीने मरने पर ,पंडित याने ज्ञान निपुण ,शोक नही करते। वैसे देखने जाए तो अपना देह कर्म ही महाभारत युद्ध समान है ,जिसमे 9द्वार, 20 उंगलिया, 2 हाथ ,2 पांव, 32 दांत ,जीभ ,ओर जॉइंट्स ,वगेरे मिलाकर जिससे कर्म कियाजाता है ,यानी कौरव 100 है .अपना छोटा बडा दिमाग ,अंधे याने, गांधारी ,धृतराष्ट्र है ,अपनी पांच इंद्रिया पांडव है ,और छठी इन्द्रिय सूर्यपुत्र सम कर्ण है मन द्रौपदी है वह गुप्त रहेगी उसे नंगा करना असंभव है ।पल पल संग्राम करके, इन्द्रीय ओर उनके विषय के लिए ,कौरव के साथ संग्राम होता है। तो द्वितीय अध्याय सिखाता है।ओर यह देहसे कर्म करना जरूरी है ,कितना भी कष्ट क्यों न आए, गर्मी ठंडी ,सुख दुख, परेशान करते है, मगर जो स्थितप्रज्ञ रहके कर्म करता है ,उसे तकलीफ महसूस नही होती ।और स्थितप्रज्ञ किसे कहते है, वह समजाते है ,और इसके लिए निरंतर अभ्यास याने प्रेक्टिस जरूरी है।स्थित प्रज्ञ ,समाधिस्थ याने हरेक परिस्थितिमे स्थिर रहकर ,सम पर विश्वाससे आधीन रह कर कर्म करे ,उसे समाधिस्थ कहते है। बहोत श्लोक है, जिससे वह, अर्जुन याने देहिमे रहे मन को कैसे तैयार करना ,वह समजाते है ,इसे सांख्य योग नामक अध्याय कहा है।
यह कर्म करने पहले चेतना, याने प्रज्ञा ,वह भी स्थीर धैर्य के साथ ,जरूरी है ।और बाद अध्याय 3में कर्म पर जोर दिया है।
दूसरे अध्यायमे वेदोंको त्रिगुणात्मक कहकर ,मनको गुणातीत करने कहाहय। कर्म करनेके लिए यह भी कहा है ,कि कोई काम करनेकी शरुआत करते, यह काम पूरा होगा या नही वह सोचना ठीक नहीं, कोइनकोयी आगे बढ़ाएंगे।तुमहरे हाथमे सिर्फ कर्तव्य करना है ,उससे लाभ होगा या हानि वह तुमरे हाथमे नही है।मगर कर्मफल हेतु मेरे अभिप्रायसे दुष्फल हेतु रख कर्म न कर और अकर्मी न बन।
जोभी है ,स्थित प्रज्ञ के बारेमे भी विस्तृत बाते कही है, मगर कहीभी आत्माका उल्लेख नही है।
तीसरे अध्यायमे मन बोलता है कि यह सब ज्ञानही लेना है तो मैं कर्म क्यों करू ? तभी श्री कृष्ण कहते है कि ,ज्ञान योगी हो या कर्म योगी ,कोईभी बिना कर्म किए जी नही सकता । कर्म यज्ञ, देवोके लिए करना है, यहाँ पर हम यज्ञको, हवन समजते है ,वह गलत है। सुव्यवस्थित ,विज्ञान नियमानुसार कर्म, वह यज्ञ है अनाज उगाना ,साफ करना ,बेचना ,वह सब यज्ञ है रथ चलाना, हथियार बनाना ,अन्य पशु पालन ,शिक्षण ,यह सब यज्ञ कर्म ही है।हरेक अपनी अपनी वृत्ति ,क्षमता, अनुसार कर्म करता है । रथ चलाना रथी का धर्म है, और घोडेसवारी वह राजा सैनिक वगेरेका धर्म है ,मगर रथी अपना धर्म छोड़ सैनिक बनने जाय वह ,पर धर्म भयावह जयसि बात हुई।
इसमें भी आत्मशब्द ,अपने आप ,याने खुदके लिए है। यहां आत्मस्थ अपनेआपमे स्थिर रहनेके लिए उपयुक्त हुवा है।
श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 2 श्लोक 28 यह श्लोक हम निष्काम भाव और एक साधारण तौर पर देखे तो समजना आसान हो जाएगा यहाँ अर्जुनको भारत कहा है। अव्यक्तादिनी भूतानि यहाँ सिर्फ शरीर ही न समजे जो भी हम भुत याने हुई गई चीज समजले एक बड़ा पत्थर है उसे तोड़कर बाजुमे एक पानीका छोटासा कुण्ड है उसमे डालकर भरदेते है तो पत्थर पत्थर नहीं रहता कुण्ड कुण्ड नहीं। अपनी नई मर्सिडीज़ तैयार होकर आई तो पुर्जे मर्सिडीज होगए बाद एक भयंकर दुर्गतनामे जल गई तो अव्यक्त हो गई ।इसी तरह सर्व शरीर पेड़ पौदे फल फूल सब जब निर्माण होते है तब दीखते है और नष्ट होनेके बाद नहीं। तो ऐसी नाशवंत का शोक क्या करना महेंगा काच नदी परका बाँध वगेरह ।एक बात उनका शोक क्या करना यह बात शब्द प्रयोग परिवेदना है शोक दुःख होना स्वाभाविक है मगर परिवेदना उस वेदना से चिटक रहना योग्य नहीं।गतम् न शोच्यम्।
औरभी बहोत सारी बाते है।
कल मैने मेरी समज अनुसार श्रीमद भगवद्गीता अध्याय 2 की संक्षिप्त बात कहीथी।इस पूरे अध्यायमे शरीर, सत ,असत ,स्थितप्रज्ञ ,वगेरे बातें है।कहीभी आत्मा शब्दका प्रयोग नही हुआ है।श्लोक 12 से 38 तक देहि शरीर सत असत वगेरेकी बात है ।प्रथम अध्याय अर्जुन विषाद योग याने अपने मनका भय कंटाला ।ओर अध्याय 2 श्लोक 11तक काम न करनेकी बहाने बाजी। अध्याय 2 श्लोक 39 प्रथम बार शब्द आत्मस्थ वापरा गया है उसका मतलब अपने आपमे स्थिर,और बाकी कर्मके बारेमे कर्म निस्पृह होकर करने का कहा है।
यज्ञ देवोको प्रसन्न करनेकेलिए, अगर परमेश्वर एक है तो देवोकि बात क्यों? इसलिये की जिस देवोकि बात है, वह पंचदेवसे है ,याने पृथ्वी ,वायु ,जल ,अग्नि, आकाश ,और यह ऋतु चक्रकी बात है। इस बात अध्याय 3 श्लोक 14 15 16 से समज आएगा, श्लोक 17 जो मनुष्य अपने अंतरात्मा से प्रीति तृप्ति संतुष्टि मिलती है उनके कार्यों नही दिखते नविद्यते।
प्रथम मनविषाद दूसरा शरीर और ब्रह्म सत्य, शरीरकी इन्द्रीया उनके विकार क्रिया मन द्वारा नियंत्रण, और तीसरा कर्म ,वह भी यज्ञ है हवन नही।
अब चतुर्थ अध्याय कर्म करो कर्मफल प्रति संयस्थ भावसे। यह भी रोचक है अभी तक कही भी आत्मा परमात्माका उल्लेख नही है। ज्ञानकर्म सन्यास योग 5वा कर्म सन्यास योग और 6 यह सब कर्म आत्मसंयम के साथ करनेकी बात है ।
आज गीताजी अध्याय 5 तक आये हुए कुछ श्लोकों समजनेकी दिशामे प्रयत्न करेंगे।अर्जुन विशाद योग के बाद आए सांख्य योगके ,बारेमें देखेंगे ,सवाल था युद्ध करके मारना ,मरनेका ,वहभी अपनोको ,याने बात शरीर और निजी सबंधोकि है ।श्लोक 16 से 30 तक समजाते हैं कि शरीर ,और परब्रह्म सत ,जिनकी वजहसे शरीर है वह अमर है।31 से आगे व्यवहारिक बात होती है ,कि तेरा क्षत्रिय धर्म स्वभाव ,यह युद्ध जो धर्म युद्ध है तुम्हे करनेको मजबूर करेगा ,अगर तुम नही करेगा तो तुम्हे कायर भगोड़ा कहेगें ,जो ओर कष्टदायी होगा।इस लिए सुख दुःख लाभ अलाभ जय पराजयको सम समज कर, युद्ध कर। श्लोक 40 आगे समजाया था श्लोक 41 व्यावसायिकाणाम एकात्म बुद्धि कर्म रत रहने वाला उसमे मग्न रहता है ,जैसे छोटे बच्चेके हाथमे स्मार्ट फोन! और जो बेकार है उसकी बुद्धि अलग अलग सोचती है ।बिना कामका बेकार। श्लोक64 से इनद्रिय उनके विषय वगेरेकी बात है कैसे काबुमे लेकर काम करना वगेरे है।
यह सब कहनेका मतलब एक ही है कि जन्म बाद जीवन ही महाभारत युद्ध है ओर अध्याय 10 श्लोक 20में प्रथम ही ईश्वर कहते है अहमात्मा गुडाकेश प्राणिनाम।।।।।
हृदयमे हु ओर प्राणियोका आदि मध्य अंत भी में ही हुं।
ज्ञान कर्मसन्यास अपने गुणों के अनुसार करनाही पड़ेगा अंत अध्याय 18 मे कहा है कि आपका गुण ही आपको काम करवाएगा।
आज अध्याय 5 श्लोक 14 15 बारेमे कहता हूं। हमलोग ज्यादातर समजते है कि ईश्वर अपना पाप पुण्यको देखता है ।और कर्म करता कर्म फल वोही कराता हैं।मगर ऐसा है नही हम सब ,मनुष्य ,प्राणी ,पक्षी ,जलचर ,स्थलचर ,उड़ने वाले पंखी ,मच्छर ,माखी ,सभी अपनी प्रकृति अनुसार चलते है ।ईश्वर किसीका पाप और पुण्य अपने पर लेता नही हमे अज्ञानताके कारण ऐसा दिखता है ।हम किसीको निस्वार्थ मदद करते है ,किसीको नोकरी दे मदद करते है ,टेक्स चुराते है, किसीके हकका छिनते है ,तो उसका परिणाम कभी भी हमे भुगतना ही पड़ता है।आप गंदगी करो , ओर मच्छर ड़ेंगूका हो ,तुम्हें कटे ,या किसी औरको ,आपको या उसको किसीको भी डेंगू हो सकता है ।
तो फिर क्या ? तो श्लोक 16 से लेकर बताया है आप पहले ज्ञान प्राप्त करे ,और ज्ञान बुद्धिके ताल मेलसे जाने की क्या सही है ,श्लोक 18 ऐसा विनय युक्त, ब्राह्मण चांडाल हाथी कुत्ते सबमे समान दृष्टि रखते है। यह सब आपको निरंतर अभ्याससे याने Continued Practice से प्राप्त होता है ।हम परीक्षामे पेपर ब्लेंक देंगे ,तो नापास ही होंगे ,सिवाय कोई टीचर पैसे लेकर आपको पेपर लिखवा सके और मार्क मिले अंतिम जो होगा वह आगेकी बात।
अध्याय 6 जो आत्म संयम योग से जाना जाता है उसका प्रथम श्लोक यह कहता है ,कि जो मनुष्य कर्मफल के आश्रयको छोड़ ,अपना कर्म कार्य करे, वह सन्यासीभी है और योगी भी ,मगर जो बिना तेज काम करनेके खातिर काम करे, या निष्क्रिय बैठे, वह नातो सन्यासी है या योगी।
योगमे प्रवेश करनेकी इच्छा रखने वाले को ,अनासक्ति पूर्वक कर्म ,साधन है ,और जो योगारूढ़ होता है, उसका साधन शम, याने धैर्य ,और न्याय विवेक पूर्ण रहना।
श्लोक 4 से लेकर आगे योगिका लक्षण, कैसे योगी होना व लिखा है ,यहां आत्मा शब्द प्रयोग अपने खुदके लिए है ,और जो अंतरात्मा भी होता है ,मगर हम जो आत्मा समजते है ये यह नही है ।आत्मा ही आत्माका शत्रु ओर बंधु होता है ,याने हम अपने आपके शत्रु या बंधु होते है ,हमेरे कर्म अनुसार। ज्यादा सोनेवाला, ज्यादा जगाने वाला ज्यादा भूखा रहने वाला या ज्यादा खाने वाला, योगी नही होसकता।योग भ्रष्ट किसी सच्चे अमीर या ज्ञानिके घर जन्मलेता है ,और योग आगे बढ़ाता है।अन्तमे कहा है
की जो योगी अन्तरात्मासे ईश्वरसे पूर्ण श्रद्धा पूर्वक जुड़ कर ईश्वरको भजता है वह श्रेष्ठ योगी है।
अध्याय 7 ज्ञान विज्ञान योग कहा जाता है।
जिसमे कहा है, कि पृथ्वी ,जल ,वायु ,अग्नि ,आकाश, मन, बुद्धि ,अहंकार याने यूनिक आइडेंटिटी ,वह जीवोंकी अपरा जड़ प्रकृति है ,जब ईश्वरकी चैतन्य जीवरूपी प्रकृति, परा कहलाती है ,जैसे इलेक्ट्रिक करंट कारण जड़ वस्तु अपने अपने गुणानुसारचले जैसे फ्रिज ,पंखा ,हीटर ,लिफ्ट ,व चले।
इलेक्ट्रीसिटी सबमे है, मगर उसमे कोई नही ।वैसेही ईश्वरमे सब है मगर ईश्वर किसमे भी नही। श्लोक 21 मूर्ति पूजाका समर्थन करता है ।श्लोक 24 25 26 कहते है ईश्वर निर्गुण निराकार अजन्मा अदृश्य है।
अध्याय 8 जिसे अक्षर भ्रह्म योगसे जाना जाता है ।अभी तक आत्मा शब्दका प्रयोग नही हुआ है और जहाँ हुआ है ,वह भी संदर्भ अलग है ।सर्व प्रथमसेही ब्रह्म शरीराणि वगेरे कहा है ।अब इस अध्यायमे कहते है जो नाश रहित तत्व है वह ब्रह्म है ,और इस भ्रह्मका स्वभाव आध्यात्म कहलाता है ,ब्रह्मकी प्राणी मात्र उत्पन्न करनेकी क्रियाको, कर्म कहते है ,ओर जो नाशवंत है वह अधिभूत कहलाता यह,चैतन्य अधिदेव है, ओर देहधारियों में श्रेष्ठ जो देहमे है वह अधीयज्ञ कहलाता है।
अंतकाल जो भी शरीर जिस भावके साथ देह छोड़ता है वही भाव उसे प्राप्तहोता है। इस कारण निरंतर ईश्वर भावमे रत रहते देह छोड़ते,तब ईश्वर प्राप्त कर सकता है।
ब्रह्मा के दिन और रात सृष्टिके उदय ओर विलयके समय है।वह 1000 युगका है।मगर इससेभी उपरका भाव जो कभी नष्ट नही होता और जहाँ आकर योगी वापस नही जाता वह भाव ,अक्षर कहलाता है ,जो ईश्वर परम पुरुषोत्तमका है। जिस मार्गसे योगी वापस नही आता ।या जहा जीवन मृत्यु चक्र है उसे काल याने समा कहते हैं।
अध्याय 9 राजविद्याराजगुह्य योग नाम दिया है। यहां सबसे महत्वके श्लोक 4 ,जिसमे कहा है कि ईश्वरका अव्यक्त भाव से ही यह सारी सृष्टि है ,और सब भूत, याने सर्व जो होचुका है वह ईश्वरमे है मगर ईश्वर कीसीमे नही।
जयसे बाल कटवाने बाद बाल मेरेमे थे अब में उसमे नही।
श्लोक 5 यहाँ प्रथम आत्मा शब्द प्रयोग हुआ जो कहता है भूतोंको उत्पन्न करनेवाला ओर मारने वाला मेरा आत्मा उनमे नही है।
ओर इसी संदर्भ मे अध्याय 10 विभूति योग श्लोक 20 सर्व भूतोंके आशय स्थित मेरा आत्मा स्वरूप में ,उनका आदि मध्य अंत में ही हु। श्लोक 40 41 42 कहता है कि उनकी अनगिनत विभूतिया है अनंत है जो दिव्य प्रकाशमान है वह में हु वहां तक कहा है कि प्रकाश सूर्य चंद्र अग्नि ज्योत सब मेही हु। ओर अन्तमे कहते है कि मेरे एक अंश मात्र से मैने सर्व जगत धारण किया है।
अध्याय 11 विश्वरूप दर्शन जो अर्जुन दिव्य चक्षुके कारण अर्जुन देखता है और डर जाता है।

सिर्फ महसूस हो सकता है।
विश्वरूप दर्शन अर्जुनको दिव्य चक्षु दिए ,फिरभी कहता है ,कि एक साथ हज़ार सूर्यका प्रकाशसेभी ज्यादा तेज था ईश्वरका!! तेज याने भर्ग ,ओर तेजदेने वाला भर्गोदेव ,याने स्वयम ईश्वर ,छंदोमे गायत्री छंद भी वही हैं।यह रूप तत्व दर्शन अनन्य भक्तिसेही महसूस होता है।अनासक्त, सर्व प्राणी पर बैर नही रखनेवाला, ईश्वर परायण ,कर्म निष्काम करनेवाला, ही महसूस कर सकता हैं।
12वा अध्याय भक्ति योग पर है श्लोक 14 से 20 कैसे रहना वह सिखाता है और भक्ति कैसी होनी चाहिए सिखाता है। कर्म फल त्याग पर जोर हैं।
13वा अध्याय क्षेत्र याने शरीर ,खेत्रज्ञ याने ईश्वर ,जो शरीरका ज्ञान है वह ज्ञेय कहलाता है।हमेरे शरीरमे क्या होता है ,यह सिर्फ हमें ही मालूम होता है ।वैद मददगार है।। श्लोक 6 से 19 शरीर के बारेमे है, 6 ओर 7 पंचमहाभूत ,अहंकार ,बुद्धि ,मूल प्रकृति, दस इन्द्रीया, एक मन ,इंद्रियोंके पाँच विषयो ,वगेरे क्षेत्रके बारेमे कहा है। प्रकृति और पुरुष अनादि है, राग ,द्वेष ,सद्गुण ,सब विकार ,प्रकृतिसे उत्पन्न हुए।कार्य कारण के कर्ताका हेतु प्रकृति है और सुख दुख के भोक्ता हेतु पुरुष जीवात्मा जो आत्मा से जुड़ा है, सबमे है यहां जीवात्मा प्लग सॉकेट द्वारा जैसे बिजली सबमे पहोचती है वैसे।
अध्याय 14 से 18 ज्यादा तर 14 16 17 18 त्रिगुणात्मक बाते है ।और 15 वे अध्याय ,पुरुषोत्तम योग ,श्रुष्टि जटिलता वर्णन ओर अन्तमे कहा है अव्यक्त निर्गुण निराकार एक ही पुरुषोत्तम है। ओर भक्ति वैरागसे मुक्ति।
बाकी ऐरे गेरेको गीता नही सुनानेका। ओर जो भाग्यमे लिखा है वह होगा जो आप प्यारसे स्वीकारोगे तो दुख कम होगा। जय श्री कृष्ण।
मैने जितना समज पाया वह लिखा यह सब मार्कण्डकी सद्गति लिए। हर हर महादेव।

अध्याय 9 श्लोक 20, अध्याय 15 श्लोक 13 ठीक समजो गे सोम पा याने फल वनस्पति खाने वाला होता है।सोम रस याने फलोका रस या आयुर्वेदिक औषधि

अधिक मास जो पुरुषोत्तम मास नाम से जाना जाता है इसमें महत्व समजना जरूरी है । आप देखेंगे कि श्रीमद भगवद गीतामें श्लोक जहाँतक हम बराबर न समजे वहाँ तक ख्याल नहीं आएगा । अध्याय 9 श्लोक 5 मे प्रथम शब्द आत्माका प्रयोग होता है ओर इसलिएकी सर्वभूतों याने विश्वमे जो होगया है वह सब मूल एक ईश्वरके प्राणके आधारसे टिके है मगर वह आत्मा किसमेभी नही ।
श्लोक 10 कहता है मेरी अध्यक्षता में मेरी प्रकृति इस समग्र जड़ चेतन सृष्टि उत्पन्न करती है श्लोक 8 के साथ पढ़ते ख्याल आता है कि यह प्रकृतिके कारण यह सृष्टि चलती है लय होती है प्रकट होती है। यह भाव है । ऋग्वेद प्रातः संध्या अघमर्षण मंत्र सपष्ट बताता हैं।अध्याय 13 क्षेत्र क्षेत्रज्ञ योग मे यह सब शरीर वह क्षेत्र है और इसकी सर्व जानकारी रखनेवाला ईश्वर क्षेत्रज्ञ है। श्लोक 13 कहता है वह सत भी नही असतभी नही उससे भी परे हैं ।श्लोक 14 जो पुरुष सूक्तमे कहा है सर्व तरफ हाथ पांव नेत्र कान बहु मस्तक तरह यह रहा है।जिसे ब्रह्म भी कहते है। सभी इन्द्रियों द्वारा ही आभास होता है श्लोक 15, सर्व भूतोंके बाहर ओर अंदर है बहोत दूर ओर बहोत नजदीक है उसी ब्रह्मसे परे ईश्वर निर्गुण निराकार है और ज्योतिओक भी ज्योति है ।श्लोक 16 17 18 अध्याय 15 श्लोक 18 क्षर ओर अक्षरसे बी पर एक ही ईश्वर परम पुरुषोत्तम है।
पहले देवी सूक्त रखा था और निरवानाष्टक रखा था।
अच्छा बुरा सुर असुर सब ईश्वर रचना है। ईश्वर किसीके पाप पुण्य अपने पर नही लेता ।हरेक को अपने अपने कर्मका फल खुद ही भोगतना पड़ता है। नरसिंह महेताके पदों का नियमित पाठ उचित है ।जय हाटकेश।
पुरुषोत्तम मास अपना दिमागको ओवरहॉलिंग करने लिये है। बोलते है कि रोज गीताजीका 15वा अध्याय समझ पूर्वक पाठ कीजिये। क्योकि इसमें संसारकी सभी जटिलता दिखाई है ।हमे नक्की करना है कि ,इस भूल भुलाईयामे रहना है ,या बाहर निकलना है।बाहर निकलना प्रायः असंभव है। और जो निकलनेकी इच्छा करता है ,उसे जितनी कठिनाई भुगतनी पड़ती है, वह संसार से कहीं ज्यादा है ,और अंतमे जहां चांद, सूरज, बिजली, प्रकाश, कुछ नही, वह तेज देनेवालाक़े पास जाना पड़ता है ,और गए तो परत लौटना ना मुमकिन है। तो नरसिंह महेताके अनुसार भूतल भक्ति पदारथ बढ़िया ब्रह्मलोकमे नाही रे। पूण्य करी अमरापुरी भेटा अन्ते चौरासी में ही रे। हरिका जन दूजा काही नामागे मागे जनम जनम अवतार है ।नित सेवा नित कीर्तन उत्सव निरखना नंद कुमार रे ।
ब्राह्मण उसे कहते है ,जो मनसा, वाचा ,कर्मसे ,निरंतर परब्रह्मके साथ जुड़ा है ,जो नियत कर्म ,करता होते भी ,कर्म एक दायित्व है, समझकर करता है ।कर्तुत्व अभिमानसे मुक्त है, कर्म फलकी तृष्णा नही, इशावास्यम इदम सर्वम।
ऐसे ब्राह्मणको गुरु, जो प्रजापति द्वारा सहज यग्नोपवित पुरस्कृत करता है। ब्राह्मणके दायित्व कहीभी, कभीभी ,आयुष्यमे ,गुत्थी आये, तो उसे शुभर याने स्वच्छता पूर्वक , सुलजाये वह अग्रता हो।
क्योकि तभी ,परम पवित्र यग्योपवित ,उसका बल और ओर तेज हो। ।
श्रीमद भगवद्गीता एक उत्तम बात कही की मन और व्यवहार ऐसा हो कि नव द्वार से सात्विकता ही ज़लके ।नव द्वार आँखे सात्विक देखे कान सात्विक सुने नाक सात्विक सूंघे मुह सात्विक खाय ओर सात्विक बोले ओर गुदा ओर मूत्रमार्ग भी सात्विक रहे तभी आप सत्व प्राप्तकरने योग्य हो सकेगें।
त्रिगुणका भेद ओर विचार अध्याय 16 17 18 में हैं।
गीताजीकी बातें कीन्हे न कहनी न सुनानेकि वगेरे उसमेही लिखी है ।।
सच देखनेको जाओगे तो आजके युगमे सबसे कठिन बात यह है।
हम जो देखते है सुनते हैं खाते है सूंघते है ज्यादातर असात्विक है इसलिए हम बीमार होते है क्योंकि हमारा पेट साफ नही आता या मूत्रमे दाह होता हैं ।और होजरी में ज्वलन होती है एसिडिटी।।
पुरुषोत्तम मास है ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष द्वादश तिथि चंद्र राशि मेष ।दूसरे पंचांग जो पूर्णिमांत है निज ज्येष्ठ द्वादश कृष्ण पक्ष ।रमज़ान।11 जून सोमवार याने वार एकहि है अंग्रेजीमे मंडे ओर संस्कृतमे चंद्र वास ।वैसे ही गिताजीके पन्ने देखता था।अध्याय 10 श्लोक 42 कृष्ण कहते है यह समग्र जगत मेरे एक अंश मात्रसे धारण किया हुआ है।और तुम्हें क्या ओर जानना है।मेरे मनमे विचार आया कृष्णकी बाल लीला टच ली उँगलिसे गोवर्धन उठाया था ।11 में विश्वरूप दर्शन जो कृष्ण भगवान द्वारा दी गयी दिव्य दृष्टिके कारण देख पाया और एक साथ हज़ारों सूर्य तेज दे ऐसा तेज था।
और अनंत व्याप्त ख़ुशी औऱ भय दोनोसे अर्जुन कांप रहाथा।
मेरे दिमागमें विचार आया आजकल फेंटेसी लेंड इमेजिका यूनिवर्सल स्टूडियो डिज़नी वगेरे की राइड में थ्रिल तभी आएगी जब हम अपने आपको स्वस्थ रख सके। तो हैम इस जीवनमे अपनेको जो दायित्व मिले वह कुशलता पूर्वक निभाते आपन तेज समालो आप यह लाइन हनुमान चालीसा की है मगर जानबूझ कर लिखी है। अगर हम ऊपर लिखा वैसे अपने आपे में रहकर निष्काम कर्तव्य निभाएंगे तो सही तरह जी पाएंगे ।बस अविनाश व्यास की याद चकडोल। ओर नरसिंह महेता अनुसार आत्माको तत्व चिंतन।

आज अब श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 13 क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विषयमे पढ़ रहाथा तब कुछ बातें मेरी दृष्टिसे समझ मे आयी यह लिखरहा हु।
इससे पहले मय एक आजके समयकी बात कहता हूं। मेरे पास तीन हार्ड ड्राइव है जिसमे पुराने फोटो वीडियो एनरोइड केमेरपर किये गए काम सब स्टोर्ड है ।अब उसकी डुप्लीकेट दूसरी ड्राइव पर है। कुछ अन्य क्लाउड पर। है ।पुराना लेप्टोपसे निकाले हुआ यह डेटा है।वह कॉम्युटर इर रिपेरेबल हुआ नया लिया उस पर यह हार्ड ड्राइव डेटा नही वापर सकता क्योंकि वह करप्ट है या अंकोमपेटेबल है ।
अब हमारे शरीर जिसके कर्म जहाँ स्टोर्ड है वहाँ ऐसा कॉम्पेटेबल शरीर बैठेगा और उसको वापरते समय जो तकलीफ होगी वह अगला जन्मके कर्मोंका फल कह सकते है। यह अध्यायके 20 से 24 श्लोकमे आता है । अपनी इंद्रियां ओर उनका विषय सब पुरुष और प्रकृतिके सम्बन्धसे चलते है जैसे इलेक्ट्रिक करंट से सभी साधन। श्लोक 16 17 18 ब्रह्म के बारेमे कहते है ब्रह्म स्थावर जंगम विश्व ओर अपने अंदर भी समाया है मगर परम पुरुष परमात्मा न तो सत है न असत वह अहम निर्विकल्पो निराकार रूपों विभूयाम सर्वत्र सर्वे इन्द्रियाणां सदा में समत्व न मुक्ति न बंधन चिदानंद रूपों शिवोहम शिवो हैं जिनके द्वारा दैवी सुक्ताममे लिखा हग।
आज पुरुषोत्तम मास पूर्ण होगा।नेकेड सिंग्युलरिटी कोलेपसिंग स्टार डार्क मैटर आकाशमे ओर मानव दिमागमें ।जो व्हाइट मेटर को एकदूसरेसे टकराने नहीं देती यसी तरहका काम अपने दिमागमें करती है। श्रीमद भगवद्गीता ईश्वरके मनुष्य रूप कृष्ण द्वारा कही गई है यह सब जानते है। आप पूरी गीता देखेंगे तो पता चलेगा कि हम ब्रह्म देहि भूतानि स्थावरानी चराणी वगेरे ओर आत्माका भेद बराबर नही समझते । सांख्य योग सेही यह द्विधा चालू होती है यहां लिखे गए शब्द भावको हम आत्माके साथ समज लेते है । और वहाँसे यह द्विधा चलती रहती है। इसीलिए श्लोक 72 कहता है जो पुरुष इसमें स्त्री आगयी कामना छोड़कर,ममता रहित, निस्पृह, ओर अहंकार रहित विचरता है उसे शांति मिलती है, यह स्वभावकी ही बात है। आगे ज्यादातर कर्म पर बातें है।क्योंकि जन्म होतेही हर जीव क्रियाशील होता है मगर इसमें सलाह मनुष्यको है ।अध्याय 3 श्लोक 42 बुद्धिसे परे स: है, जिसे हम आत्मा मनालेते है।43 श्लोकमे आत्मा का प्रयोग स्वयम या खुद के लिये है ।
अध्याय 2 श्लोक 72में कही गई बात अमलमे कैसे लाये वह सब आगे के अध्यायों में आती है इसमें ज्ञान योग सन्यास कर्मफल त्याग वगेरा। अध्याय 9 श्लोक 4 ,5, जहां आत्मा शब्द प्रयोग है अव्यक्त स्वरूप से पूर्ण जगत व्याप्त है सब मुझमे है मै किसमेभी नही। जैसे हम अपने बाल नाखून अंग अपनेमे मगर हम उनमे नही बाल,नाखून, हाथ पैर किडनी वगेरे निकालने के बाद हैम उनमे नही जाते श्लोक 5 सर्व भूतोंको धारण करने वाला मेरा आत्मा उनमे नही!! मिसालके लिए इएल्ट्री सिटीसे चलने वाली चीज जहाँतक जुडी है वहाँ तक है बादमे स्विच बंध होते या चालू स्विच से प्लग निकाल नेके बाद पंखा या फ्रिज या ओवन उनमे इलेक्ट्रिक नही वह उनसे चलते है। अध्याय 10 श्लोक 20 मम आत्मा भुत भवन: कहा है।कल मैने अध्याय 10 श्लोक 42 ओर अध्याय 11 के बारेमे लिखाथा उसके पहले अध्याय 12 13 क्षेत्र क्षेत्रज्ञ के बारेमे भी लिखाथा।अध्याय 7 श्लोक 21 मूर्ति पूजा समर्थन करती है।अध्याय 14 श्लोक 27 ब्रह्मके बारेमे है। अध्याय 15 श्लोक 18 कहता है कि एक ही ईश्वर है जिसे पुरुषोत्तम कहते है । निष्काम निष्कलंक भक्तिसे ईश्वरकी अनुभूति शक्य है । आदि शंकराचार्य निरवाणाष्टक देवी सूक्त और जोभी हो ।हमे कुमति निवार सुमतिके संगी। करना है । यह मेरा छोटासा प्रयास है जय श्री कृष्ण।
अध्याय 5 श्लोक 14, 15 कहते है कि ईश्वर किसीका पाप पुण्य उनके पर नही लेता।
जो फल मिलता है हरेकको अपने अपने कर्म अनुसार।
ईश्वर किसीका हिसाब नही रखता सब कर्मबन्धन के फल है।
अध्याय 13 श्लोक 16,17 ब्रह्म की ही बात करता है जो ब्रह्म व्याप्त है वह दूर है और पास भी सूक्ष्म वह आकाश सम किसीसे लिप्त नही होता और ब्रह्मका स्वभाव आध्यात्म कहलाता है।
इसी ब्रह्मकी उत्पत्ति लय पुरुषोत्तम भगवान द्वारा होता है। आप ईश्वर जो निर्गुण निराकार है महसूस होता है वह ज्योतियोके भी ज्योति निजानंद रूप शिवोहम है।
निष्काम भक्ति श्रद्धा सबुरी जरूरी है।

If you read Shrimad Bhagavadgita with Proper Understanding without getting confused with word Atma then and only then you will get to Crux.You also should understand the word Bhut Bhutani and One and only one is God who is Generator,Organisor, Destructor! This is appropriately described in Chapter 9 stanza 4to10.
In order to give example I will resort to example of Electricity, A big power generator produces electricity which is distributed throughout the area.electric train to say battery charger all those when connected they function as per their quality and purpose ,fan,fridge, microwave, AC, lights, elevator,train,tram,etc. They all are connected to electricity at a point in the particular instrument by which it functions. All are connected to electric generated by the generator but the generator is not in any thing It is the electric power which connects both.Bhut Bhutani means any thing which has already happened. Human to mountain , Big Sea, animales fish, birds, stars moons every thing in existence.
So The God Says I am invisible,without any form I create this Universe all are connected by my atma.
All are connected to me I am not in any one.
Chapter 10 stanza 20 it is only at these stanzas word Atma is Used and nowhere else.
Going to Chapter 15 it talks about bhram and above all he is the Lord supreme.
Chapter 5 stanza 14 15 Clearly say that one is responsible for his own deeds and misdeeds, and God is not concerned with it.

एक बात ईश्वर कैसे ढूंढे सबको ईश्वर चाहिए मगर कैसे कण कण में है फिरभी क्यों नहीं दिखता ? अब जब तक मेरी समज है तो ईश्वर प्रकृति द्वारा सब सर्जन करता है और इस द्वाराही उपभोग करता है सभी इन्द्रिया द्वारा सुख दुःख संघात स्पर्श स्वाद श्रवण दृश्य वगेरह आप कभी पृतथक्करण करे तो पता चलेगा की जब हमें रोना आता है तो दिमागके एक खास हिस्सेपर सेंसेशन होता है वैसे हसीं आती हाय तब हिस्सा अलग संतोषमे अलग याने सभी अनुभूतियाँ दिमागके एक केन्द्रके इर्द गिर्द है आपको लोकल एनेस्थेशिया दिया जाय तो इतना हिस्सा कुछ समय तक सुन्न होता है मगर दर्दका अहसास दवाकी असर उतरने पर दिमागके दुःख महसूस करनेवाले छोड़ पर होता है मगर जब टोटल अनेस्थेसियामे अलग प्रतीत होता है याने स्थूल दिमाग और अनुभूति करने वाला मन अगर केंद्रित किया जाय तो आप मुक्तिका अहसास कर सकते हो यह स्थिति ब्राह्मी स्थिति मोक्षका कारण बन सकती है !!
यह एक याद अभी सोच रहाथा तब फेसबुक मेमरीमे आयी। कल जब अंग्रेजीमे लिखा कि परमात्मा पूरे विश्वको उनके आत्मसे जुड़के हमे धारण कर रहा है ।हम सब उससे जुड़े है मगर वह हम में नही जैसे एक किडनी हमारी निकालने पर किडनिमे हम नही जाते इस तरह। अब सवाल यह उठता है कि हमारे किस छिद्रसे हमें सप्लाय मिल रहा है? जैसे फैंन फ्रिज मोबाइल वगेरह क्योंकि एक ही स्पॉट होता है जब चालू करने पर हरेक चीज अपने अपने गुण धर्मके हिसाबसे चलती है ।ब्रेइन डेड व्यक्तिकी सिर्फ साँसे चलती है ।जीने के लिये आवश्यक सांस है और यह सप्लाय। याने प्रणायाम योग द्वारा हम अपने दोनों चर्म चक्षसे ज्ञान चक्षु जो अपने भाल पर आज्ञा चक्र रूपमे यजन कर पूरा ताल मेल बिठा कर इस कि अनुभूति कर सकते है ।इसके कारण अपनी सुवास वृद्धि होकर चारो ओर फैलेगी,इसके अलावा हमारी हरबात ओर कर्मकी पुष्टि बढ़ेगी और हम जन्म मृत्युके अवगमनसे मोक्ष तरफ जा पाएगे । यही है त्र्यम्बकम यजामहे!!

या निशा सर्व भूतानाम तस्याम जाग्रति संयमि। जभी लोग बेफाम और बेख़ौफ़ होकर जी रहेहो तब जो राजा है वह खुद निश्चिन्त नहोकर संयम धरके जाग्रत रहे क्योकि अंदरुनी लड़ाई नहो और आंतरिक सुरक्षा और शान्ति बानी रहे। और जब अपनी जिम्मेदारी सह और देशके प्रति लोग जाग्रत हो तभी वह मौन रहकर रात में चारो और निगरानी रखे।यह होताहै यस्याम जाग्रती भूतानि सा निशा पश्यतो मुनि।यह एक सही सोचके साथ अर्थ निकाला है ।

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पुरुषोत्तम मास ओर गीताजी

अधिक मास जो पुरुषोत्तम मास नाम से जाना जाता है इसमें महत्व समजना जरूरी है । आप देखेंगे कि श्रीमद भगवद गीतामें श्लोक जहाँतक हम बराबर न समजे वहाँ तक ख्याल नहीं आएगा । अध्याय 9 श्लोक 5 मे प्रथम शब्द आत्माका प्रयोग होता है ओर इसलिएकी सर्वभूतों याने विश्वमे जो होगया है वह सब मूल एक ईश्वरके प्राणके आधारसे टिके है मगर वह आत्मा किसमेभी नही ।
श्लोक 10 कहता है मेरी अध्यक्षता में मेरी प्रकृति इस समग्र जड़ चेतन सृष्टि उत्पन्न करती है श्लोक 8 के साथ पढ़ते ख्याल आता है कि यह प्रकृतिके कारण यह सृष्टि चलती है लय होती है प्रकट होती है। यह भाव है । ऋग्वेद प्रातः संध्या अघमर्षण मंत्र सपष्ट बताता हैं।अध्याय 13 क्षेत्र क्षेत्रज्ञ योग मे यह सब शरीर वह क्षेत्र है और इसकी सर्व जानकारी रखनेवाला ईश्वर क्षेत्रज्ञ है। श्लोक 13 कहता है वह सत भी नही असतभी नही उससे भी परे हैं ।श्लोक 14 जो पुरुष सूक्तमे कहा है सर्व तरफ हाथ पांव नेत्र कान बहु मस्तक तरह यह रहा है।जिसे ब्रह्म भी कहते है। सभी इन्द्रियों द्वारा ही आभास होता है श्लोक 15, सर्व भूतोंके बाहर ओर अंदर है बहोत दूर ओर बहोत नजदीक है उसी ब्रह्मसे परे ईश्वर निर्गुण निराकार है और ज्योतिओक भी ज्योति है ।श्लोक 16 17 18 अध्याय 15 श्लोक 18 क्षर ओर अक्षरसे बी पर एक ही ईश्वर परम पुरुषोत्तम है।
पहले देवी सूक्त रखा था और निरवानाष्टक रखा था।
अच्छा बुरा सुर असुर सब ईश्वर रचना है। ईश्वर किसीके पाप पुण्य अपने पर नही लेता ।हरेक को अपने अपने कर्मका फल खुद ही भोगतना पड़ता है। नरसिंह महेताके पदों का नियमित पाठ उचित है ।जय हाटकेश।
पुरुषोत्तम मास अपना दिमागको ओवरहॉलिंग करने लिये है। बोलते है कि रोज गीताजीका 15वा अध्याय समझ पूर्वक पाठ कीजिये। क्योकि इसमें संसारकी सभी जटिलता दिखाई है ।हमे नक्की करना है कि ,इस भूल भुलाईयामे रहना है ,या बाहर निकलना है।बाहर निकलना प्रायः असंभव है। और जो निकलनेकी इच्छा करता है ,उसे जितनी कठिनाई भुगतनी पड़ती है, वह संसार से कहीं ज्यादा है ,और अंतमे जहां चांद, सूरज, बिजली, प्रकाश, कुछ नही, वह तेज देनेवालाक़े पास जाना पड़ता है ,और गए तो परत लौटना ना मुमकिन है। तो नरसिंह महेताके अनुसार भूतल भक्ति पदारथ बढ़िया ब्रह्मलोकमे नाही रे। पूण्य करी अमरापुरी भेटा अन्ते चौरासी में ही रे। हरिका जन दूजा काही नामागे मागे जनम जनम अवतार है ।नित सेवा नित कीर्तन उत्सव निरखना नंद कुमार रे ।
ब्राह्मण उसे कहते है ,जो मनसा, वाचा ,कर्मसे ,निरंतर परब्रह्मके साथ जुड़ा है ,जो नियत कर्म ,करता होते भी ,कर्म एक दायित्व है, समझकर करता है ।कर्तुत्व अभिमानसे मुक्त है, कर्म फलकी तृष्णा नही, इशावास्यम इदम सर्वम।
ऐसे ब्राह्मणको गुरु, जो प्रजापति द्वारा सहज यग्नोपवित पुरस्कृत करता है। ब्राह्मणके दायित्व कहीभी, कभीभी ,आयुष्यमे ,गुत्थी आये, तो उसे शुभर याने स्वच्छता पूर्वक , सुलजाये वह अग्रता हो।
क्योकि तभी ,परम पवित्र यग्योपवित ,उसका बल और ओर तेज हो। ।
श्रीमद भगवद्गीता एक उत्तम बात कही की मन और व्यवहार ऐसा हो कि नव द्वार से सात्विकता ही ज़लके ।नव द्वार आँखे सात्विक देखे कान सात्विक सुने नाक सात्विक सूंघे मुह सात्विक खाय ओर सात्विक बोले ओर गुदा ओर मूत्रमार्ग भी सात्विक रहे तभी आप सत्व प्राप्तकरने योग्य हो सकेगें।
त्रिगुणका भेद ओर विचार अध्याय 16 17 18 में हैं।
गीताजीकी बातें कीन्हे न कहनी न सुनानेकि वगेरे उसमेही लिखी है ।।
सच देखनेको जाओगे तो आजके युगमे सबसे कठिन बात यह है।
हम जो देखते है सुनते हैं खाते है सूंघते है ज्यादातर असात्विक है इसलिए हम बीमार होते है क्योंकि हमारा पेट साफ नही आता या मूत्रमे दाह होता हैं ।और होजरी में ज्वलन होती है एसिडिटी।।
पुरुषोत्तम मास है ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष द्वादश तिथि चंद्र राशि मेष ।दूसरे पंचांग जो पूर्णिमांत है निज ज्येष्ठ द्वादश कृष्ण पक्ष ।रमज़ान।11 जून सोमवार याने वार एकहि है अंग्रेजीमे मंडे ओर संस्कृतमे चंद्र वास ।वैसे ही गिताजीके पन्ने देखता था।अध्याय 10 श्लोक 42 कृष्ण कहते है यह समग्र जगत मेरे एक अंश मात्रसे धारण किया हुआ है।और तुम्हें क्या ओर जानना है।मेरे मनमे विचार आया कृष्णकी बाल लीला टच ली उँगलिसे गोवर्धन उठाया था ।11 में विश्वरूप दर्शन जो कृष्ण भगवान द्वारा दी गयी दिव्य दृष्टिके कारण देख पाया और एक साथ हज़ारों सूर्य तेज दे ऐसा तेज था।
और अनंत व्याप्त ख़ुशी औऱ भय दोनोसे अर्जुन कांप रहाथा।
मेरे दिमागमें विचार आया आजकल फेंटेसी लेंड इमेजिका यूनिवर्सल स्टूडियो डिज़नी वगेरे की राइड में थ्रिल तभी आएगी जब हम अपने आपको स्वस्थ रख सके। तो हैम इस जीवनमे अपनेको जो दायित्व मिले वह कुशलता पूर्वक निभाते आपन तेज समालो आप यह लाइन हनुमान चालीसा की है मगर जानबूझ कर लिखी है। अगर हम ऊपर लिखा वैसे अपने आपे में रहकर निष्काम कर्तव्य निभाएंगे तो सही तरह जी पाएंगे ।बस अविनाश व्यास की याद चकडोल। ओर नरसिंह महेता अनुसार आत्माको तत्व चिंतन।

आज अब श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 13 क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विषयमे पढ़ रहाथा तब कुछ बातें मेरी दृष्टिसे समझ मे आयी यह लिखरहा हु।
इससे पहले मय एक आजके समयकी बात कहता हूं। मेरे पास तीन हार्ड ड्राइव है जिसमे पुराने फोटो वीडियो एनरोइड केमेरपर किये गए काम सब स्टोर्ड है ।अब उसकी डुप्लीकेट दूसरी ड्राइव पर है। कुछ अन्य क्लाउड पर। है ।पुराना लेप्टोपसे निकाले हुआ यह डेटा है।वह कॉम्युटर इर रिपेरेबल हुआ नया लिया उस पर यह हार्ड ड्राइव डेटा नही वापर सकता क्योंकि वह करप्ट है या अंकोमपेटेबल है ।
अब हमारे शरीर जिसके कर्म जहाँ स्टोर्ड है वहाँ ऐसा कॉम्पेटेबल शरीर बैठेगा और उसको वापरते समय जो तकलीफ होगी वह अगला जन्मके कर्मोंका फल कह सकते है। यह अध्यायके 20 से 24 श्लोकमे आता है । अपनी इंद्रियां ओर उनका विषय सब पुरुष और प्रकृतिके सम्बन्धसे चलते है जैसे इलेक्ट्रिक करंट से सभी साधन। श्लोक 16 17 18 ब्रह्म के बारेमे कहते है ब्रह्म स्थावर जंगम विश्व ओर अपने अंदर भी समाया है मगर परम पुरुष परमात्मा न तो सत है न असत वह अहम निर्विकल्पो निराकार रूपों विभूयाम सर्वत्र सर्वे इन्द्रियाणां सदा में समत्व न मुक्ति न बंधन चिदानंद रूपों शिवोहम शिवो हैं जिनके द्वारा दैवी सुक्ताममे लिखा हग।
आज पुरुषोत्तम मास पूर्ण होगा।नेकेड सिंग्युलरिटी कोलेपसिंग स्टार डार्क मैटर आकाशमे ओर मानव दिमागमें ।जो व्हाइट मेटर को एकदूसरेसे टकराने नहीं देती यसी तरहका काम अपने दिमागमें करती है। श्रीमद भगवद्गीता ईश्वरके मनुष्य रूप कृष्ण द्वारा कही गई है यह सब जानते है। आप पूरी गीता देखेंगे तो पता चलेगा कि हम ब्रह्म देहि भूतानि स्थावरानी चराणी वगेरे ओर आत्माका भेद बराबर नही समझते । सांख्य योग सेही यह द्विधा चालू होती है यहां लिखे गए शब्द भावको हम आत्माके साथ समज लेते है । और वहाँसे यह द्विधा चलती रहती है। इसीलिए श्लोक 72 कहता है जो पुरुष इसमें स्त्री आगयी कामना छोड़कर,ममता रहित, निस्पृह, ओर अहंकार रहित विचरता है उसे शांति मिलती है, यह स्वभावकी ही बात है। आगे ज्यादातर कर्म पर बातें है।क्योंकि जन्म होतेही हर जीव क्रियाशील होता है मगर इसमें सलाह मनुष्यको है ।अध्याय 3 श्लोक 42 बुद्धिसे परे स: है, जिसे हम आत्मा मनालेते है।43 श्लोकमे आत्मा का प्रयोग स्वयम या खुद के लिये है ।
अध्याय 2 श्लोक 72में कही गई बात अमलमे कैसे लाये वह सब आगे के अध्यायों में आती है इसमें ज्ञान योग सन्यास कर्मफल त्याग वगेरा। अध्याय 9 श्लोक 4 ,5, जहां आत्मा शब्द प्रयोग है अव्यक्त स्वरूप से पूर्ण जगत व्याप्त है सब मुझमे है मै किसमेभी नही। जैसे हम अपने बाल नाखून अंग अपनेमे मगर हम उनमे नही बाल,नाखून, हाथ पैर किडनी वगेरे निकालने के बाद हैम उनमे नही जाते श्लोक 5 सर्व भूतोंको धारण करने वाला मेरा आत्मा उनमे नही!! मिसालके लिए इएल्ट्री सिटीसे चलने वाली चीज जहाँतक जुडी है वहाँ तक है बादमे स्विच बंध होते या चालू स्विच से प्लग निकाल नेके बाद पंखा या फ्रिज या ओवन उनमे इलेक्ट्रिक नही वह उनसे चलते है। अध्याय 10 श्लोक 20 मम आत्मा भुत भवन: कहा है।कल मैने अध्याय 10 श्लोक 42 ओर अध्याय 11 के बारेमे लिखाथा उसके पहले अध्याय 12 13 क्षेत्र क्षेत्रज्ञ के बारेमे भी लिखाथा।अध्याय 7 श्लोक 21 मूर्ति पूजा समर्थन करती है।अध्याय 14 श्लोक 27 ब्रह्मके बारेमे है। अध्याय 15 श्लोक 18 कहता है कि एक ही ईश्वर है जिसे पुरुषोत्तम कहते है । निष्काम निष्कलंक भक्तिसे ईश्वरकी अनुभूति शक्य है । आदि शंकराचार्य निरवाणाष्टक देवी सूक्त और जोभी हो ।हमे कुमति निवार सुमतिके संगी। करना है । यह मेरा छोटासा प्रयास है जय श्री कृष्ण।
अध्याय 5 श्लोक 14, 15 कहते है कि ईश्वर किसीका पाप पुण्य उनके पर नही लेता।
जो फल मिलता है हरेकको अपने अपने कर्म अनुसार।
ईश्वर किसीका हिसाब नही रखता सब कर्मबन्धन के फल है।
अध्याय 13 श्लोक 16,17 ब्रह्म की ही बात करता है जो ब्रह्म व्याप्त है वह दूर है और पास भी सूक्ष्म वह आकाश सम किसीसे लिप्त नही होता और ब्रह्मका स्वभाव आध्यात्म कहलाता है।
इसी ब्रह्मकी उत्पत्ति लय पुरुषोत्तम भगवान द्वारा होता है। आप ईश्वर जो निर्गुण निराकार है महसूस होता है वह ज्योतियोके भी ज्योति निजानंद रूप शिवोहम है।
निष्काम भक्ति श्रद्धा सबुरी जरूरी है।

श्रीमद भगवद्गीता एक दृष्टिकोण

આજ સુધી હિન્દીમાં ગીતા અધ્યાય મારી સમજ પ્રમાણે લખ્યા ,7, દિવસ તે સંકલિત કરી અત્રે મુકું છું.
Below is my understanding of srimad Bhagavadgita ,written in hindi. Some shlokas interpretation I had shared earlier.
My logical understanding is based on context ,which is Mahabharat Yuddh between Two Kings and their Sena.
Where it is certain that many bodies will loose their lives.
आजसे मारकंदभाई के घरमे श्रीमद भगवद गीताका पाठ होगा ,वैसे हरेक समय सुखदुःखमे गीताजी मार्गदर्शिका है।
पहले ही ,अर्जुनके द्विधापूर्ण वक्तव्यके बाद ही, दूसरे अद्याय से श्रीकृष्ण उपदेश देते है.
आप अपना शरीर, जिस को देहि कहाजाता है ,उसके जीने मरने पर ,पंडित याने ज्ञान निपुण ,शोक नही करते। वैसे देखने जाए तो अपना देह कर्म ही महाभारत युद्ध समान है ,जिसमे 9द्वार, 20 उंगलिया, 2 हाथ ,2 पांव, 32 दांत ,जीभ ,ओर जॉइंट्स ,वगेरे मिलाकर जिससे कर्म कियाजाता है ,यानी कौरव 100 है .अपना छोटा बडा दिमाग ,अंधे याने, गांधारी ,धृतराष्ट्र है ,अपनी पांच इंद्रिया पांडव है ,और छठी इन्द्रिय सूर्यपुत्र सम कर्ण है मन द्रौपदी है वह गुप्त रहेगी उसे नंगा करना असंभव है ।पल पल संग्राम करके, इन्द्रीय ओर उनके विषय के लिए ,कौरव के साथ संग्राम होता है। तो द्वितीय अध्याय सिखाता है।ओर यह देहसे कर्म करना जरूरी है ,कितना भी कष्ट क्यों न आए, गर्मी ठंडी ,सुख दुख, परेशान करते है, मगर जो स्थितप्रज्ञ रहके कर्म करता है ,उसे तकलीफ महसूस नही होती ।और स्थितप्रज्ञ किसे कहते है, वह समजाते है ,और इसके लिए निरंतर अभ्यास याने प्रेक्टिस जरूरी है।स्थित प्रज्ञ ,समाधिस्थ याने हरेक परिस्थितिमे स्थिर रहकर ,सम पर विश्वाससे आधीन रह कर कर्म करे ,उसे समाधिस्थ कहते है। बहोत श्लोक है, जिससे वह, अर्जुन याने देहिमे रहे मन को कैसे तैयार करना ,वह समजाते है ,इसे सांख्य योग नामक अध्याय कहा है।
यह कर्म करने पहले चेतना, याने प्रज्ञा ,वह भी स्थीर धैर्य के साथ ,जरूरी है ।और बाद अध्याय 3में कर्म पर जोर दिया है।
दूसरे अध्यायमे वेदोंको त्रिगुणात्मक कहकर ,मनको गुणातीत करने कहाहय। कर्म करनेके लिए यह भी कहा है ,कि कोई काम करनेकी शरुआत करते, यह काम पूरा होगा या नही वह सोचना ठीक नहीं, कोइनकोयी आगे बढ़ाएंगे।तुमहरे हाथमे सिर्फ कर्तव्य करना है ,उससे लाभ होगा या हानि वह तुमरे हाथमे नही है।मगर कर्मफल हेतु मेरे अभिप्रायसे दुष्फल हेतु रख कर्म न कर और अकर्मी न बन।
जोभी है ,स्थित प्रज्ञ के बारेमे भी विस्तृत बाते कही है, मगर कहीभी आत्माका उल्लेख नही है।
तीसरे अध्यायमे मन बोलता है कि यह सब ज्ञानही लेना है तो मैं कर्म क्यों करू ? तभी श्री कृष्ण कहते है कि ,ज्ञान योगी हो या कर्म योगी ,कोईभी बिना कर्म किए जी नही सकता । कर्म यज्ञ, देवोके लिए करना है, यहाँ पर हम यज्ञको, हवन समजते है ,वह गलत है। सुव्यवस्थित ,विज्ञान नियमानुसार कर्म, वह यज्ञ है अनाज उगाना ,साफ करना ,बेचना ,वह सब यज्ञ है रथ चलाना, हथियार बनाना ,अन्य पशु पालन ,शिक्षण ,यह सब यज्ञ कर्म ही है।हरेक अपनी अपनी वृत्ति ,क्षमता, अनुसार कर्म करता है । रथ चलाना रथी का धर्म है, और घोडेसवारी वह राजा सैनिक वगेरेका धर्म है ,मगर रथी अपना धर्म छोड़ सैनिक बनने जाय वह ,पर धर्म भयावह जयसि बात हुई।
इसमें भी आत्मशब्द ,अपने आप ,याने खुदके लिए है। यहां आत्मस्थ अपनेआपमे स्थिर रहनेके लिए उपयुक्त हुवा है।
श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय  2 श्लोक 28  यह श्लोक हम निष्काम भाव और एक साधारण तौर पर देखे तो समजना आसान हो जाएगा यहाँ अर्जुनको भारत कहा है। अव्यक्तादिनी भूतानि यहाँ सिर्फ शरीर ही न समजे जो भी हम भुत याने हुई गई चीज समजले एक बड़ा पत्थर है उसे तोड़कर बाजुमे एक पानीका छोटासा कुण्ड है उसमे डालकर भरदेते है तो पत्थर पत्थर नहीं रहता कुण्ड कुण्ड नहीं। अपनी नई मर्सिडीज़ तैयार होकर आई तो पुर्जे मर्सिडीज होगए बाद एक भयंकर दुर्गतनामे जल गई तो अव्यक्त हो गई ।इसी तरह सर्व शरीर पेड़ पौदे फल फूल सब जब निर्माण होते है तब दीखते है और नष्ट होनेके बाद नहीं। तो ऐसी नाशवंत का शोक क्या करना महेंगा काच नदी परका बाँध वगेरह ।एक बात उनका शोक क्या करना यह बात शब्द प्रयोग परिवेदना है शोक दुःख होना स्वाभाविक है मगर परिवेदना उस वेदना से चिटक रहना योग्य नहीं।गतम् न शोच्यम्।
औरभी बहोत सारी बाते है।
कल मैने मेरी समज अनुसार श्रीमद भगवद्गीता अध्याय 2 की संक्षिप्त बात कहीथी।इस पूरे अध्यायमे शरीर, सत ,असत ,स्थितप्रज्ञ ,वगेरे बातें है।कहीभी आत्मा शब्दका प्रयोग नही हुआ है।श्लोक 12 से 38 तक देहि शरीर सत असत वगेरेकी बात है ।प्रथम अध्याय अर्जुन विषाद योग याने अपने मनका भय कंटाला ।ओर अध्याय 2 श्लोक 11तक काम न करनेकी बहाने बाजी। अध्याय 2 श्लोक 39 प्रथम बार शब्द आत्मस्थ वापरा गया है उसका मतलब अपने आपमे स्थिर,और बाकी कर्मके बारेमे  कर्म निस्पृह होकर करने का कहा है।
यज्ञ देवोको प्रसन्न करनेकेलिए, अगर परमेश्वर एक है तो देवोकि बात क्यों? इसलिये की जिस देवोकि बात है, वह पंचदेवसे है ,याने पृथ्वी ,वायु ,जल ,अग्नि, आकाश ,और यह ऋतु चक्रकी बात है। इस बात अध्याय 3 श्लोक 14 15 16 से समज आएगा, श्लोक 17 जो मनुष्य अपने अंतरात्मा से प्रीति तृप्ति संतुष्टि मिलती है उनके कार्यों नही दिखते नविद्यते।
प्रथम मनविषाद दूसरा शरीर और ब्रह्म सत्य, शरीरकी इन्द्रीया उनके विकार क्रिया मन द्वारा नियंत्रण, और तीसरा कर्म ,वह भी यज्ञ है हवन नही।
अब चतुर्थ अध्याय कर्म करो कर्मफल प्रति संयस्थ भावसे। यह भी रोचक है अभी तक कही भी आत्मा परमात्माका उल्लेख नही है। ज्ञानकर्म सन्यास योग 5वा कर्म सन्यास योग और 6 यह सब कर्म आत्मसंयम के साथ करनेकी बात है ।
आज गीताजी अध्याय 5 तक आये हुए कुछ श्लोकों समजनेकी दिशामे प्रयत्न करेंगे।अर्जुन विशाद योग के बाद आए सांख्य योगके ,बारेमें देखेंगे ,सवाल था युद्ध करके मारना ,मरनेका ,वहभी अपनोको ,याने बात शरीर और निजी सबंधोकि है ।श्लोक 16 से 30 तक समजाते हैं कि शरीर ,और परब्रह्म सत ,जिनकी वजहसे शरीर है वह अमर है।31 से आगे व्यवहारिक बात होती है ,कि तेरा क्षत्रिय धर्म स्वभाव ,यह युद्ध जो धर्म युद्ध है तुम्हे करनेको मजबूर करेगा ,अगर तुम नही करेगा तो तुम्हे कायर भगोड़ा कहेगें ,जो ओर कष्टदायी होगा।इस लिए सुख दुःख लाभ अलाभ जय पराजयको सम समज कर, युद्ध कर। श्लोक 40 आगे समजाया था श्लोक 41 व्यावसायिकाणाम एकात्म बुद्धि कर्म रत रहने वाला उसमे मग्न रहता है ,जैसे छोटे बच्चेके हाथमे स्मार्ट फोन! और जो बेकार है उसकी बुद्धि अलग अलग सोचती है ।बिना कामका बेकार। श्लोक64 से इनद्रिय उनके विषय वगेरेकी बात है कैसे काबुमे लेकर काम करना वगेरे है।
यह सब कहनेका मतलब एक ही है कि जन्म बाद जीवन ही महाभारत युद्ध है ओर अध्याय 10 श्लोक 20में प्रथम ही ईश्वर कहते है अहमात्मा गुडाकेश प्राणिनाम।।।।।
हृदयमे हु ओर प्राणियोका आदि मध्य अंत भी में ही हुं।
ज्ञान कर्मसन्यास अपने गुणों के अनुसार करनाही पड़ेगा अंत अध्याय 18 मे कहा है कि आपका गुण ही आपको काम करवाएगा।
आज अध्याय 5 श्लोक 14 15 बारेमे कहता हूं। हमलोग ज्यादातर समजते है कि ईश्वर अपना पाप पुण्यको देखता है ।और कर्म करता कर्म फल वोही कराता हैं।मगर ऐसा है नही हम सब ,मनुष्य ,प्राणी ,पक्षी ,जलचर ,स्थलचर ,उड़ने वाले पंखी ,मच्छर ,माखी ,सभी अपनी प्रकृति अनुसार चलते है ।ईश्वर किसीका पाप और पुण्य अपने पर लेता नही हमे अज्ञानताके कारण ऐसा दिखता है ।हम किसीको निस्वार्थ मदद करते है ,किसीको नोकरी दे मदद करते है ,टेक्स चुराते है, किसीके हकका छिनते है ,तो उसका परिणाम कभी भी हमे भुगतना ही पड़ता है।आप गंदगी करो , ओर मच्छर ड़ेंगूका हो ,तुम्हें कटे ,या किसी औरको ,आपको या उसको किसीको भी डेंगू हो सकता है ।
तो फिर क्या ? तो श्लोक 16 से लेकर बताया है आप पहले ज्ञान प्राप्त करे ,और ज्ञान बुद्धिके ताल मेलसे जाने की  क्या सही है ,श्लोक 18 ऐसा विनय युक्त, ब्राह्मण चांडाल हाथी कुत्ते सबमे समान दृष्टि रखते है। यह सब आपको निरंतर अभ्याससे याने Continued Practice से प्राप्त होता है ।हम परीक्षामे पेपर ब्लेंक देंगे ,तो नापास ही होंगे ,सिवाय कोई टीचर पैसे लेकर आपको पेपर लिखवा सके और मार्क मिले अंतिम जो होगा वह आगेकी बात।
अध्याय 6 जो आत्म संयम योग से जाना जाता है उसका प्रथम श्लोक यह कहता है ,कि जो मनुष्य कर्मफल के आश्रयको छोड़ ,अपना कर्म कार्य करे, वह सन्यासीभी है और योगी भी ,मगर जो बिना तेज काम करनेके खातिर काम करे, या निष्क्रिय बैठे, वह नातो सन्यासी है या योगी।
योगमे प्रवेश करनेकी इच्छा रखने वाले को ,अनासक्ति पूर्वक कर्म ,साधन है ,और जो योगारूढ़ होता है, उसका साधन शम, याने धैर्य ,और न्याय विवेक पूर्ण रहना।
श्लोक 4 से लेकर आगे योगिका लक्षण, कैसे योगी होना व लिखा है ,यहां आत्मा शब्द प्रयोग अपने खुदके लिए है ,और जो अंतरात्मा भी होता है ,मगर हम जो आत्मा समजते है ये यह नही है ।आत्मा ही आत्माका शत्रु ओर बंधु होता है ,याने हम अपने आपके शत्रु या बंधु होते है ,हमेरे कर्म अनुसार। ज्यादा सोनेवाला, ज्यादा जगाने वाला ज्यादा भूखा रहने वाला या ज्यादा खाने वाला, योगी नही होसकता।योग भ्रष्ट किसी सच्चे अमीर या ज्ञानिके घर जन्मलेता है ,और योग आगे बढ़ाता है।अन्तमे कहा है
की जो योगी अन्तरात्मासे ईश्वरसे पूर्ण श्रद्धा पूर्वक जुड़ कर ईश्वरको भजता है वह श्रेष्ठ योगी है।
अध्याय 7 ज्ञान विज्ञान योग कहा जाता है।
जिसमे कहा है, कि पृथ्वी ,जल ,वायु ,अग्नि ,आकाश, मन, बुद्धि ,अहंकार याने यूनिक आइडेंटिटी ,वह जीवोंकी अपरा जड़ प्रकृति है ,जब ईश्वरकी चैतन्य जीवरूपी प्रकृति, परा कहलाती है ,जैसे इलेक्ट्रिक करंट कारण जड़ वस्तु अपने अपने गुणानुसारचले जैसे फ्रिज ,पंखा ,हीटर ,लिफ्ट ,व चले।
इलेक्ट्रीसिटी सबमे है, मगर उसमे कोई नही ।वैसेही ईश्वरमे सब है मगर ईश्वर किसमे भी नही।  श्लोक 21 मूर्ति पूजाका समर्थन करता है ।श्लोक 24 25 26 कहते है ईश्वर निर्गुण निराकार अजन्मा अदृश्य है।
अध्याय 8 जिसे अक्षर भ्रह्म योगसे जाना जाता है ।अभी तक आत्मा शब्दका प्रयोग नही हुआ है और जहाँ हुआ है ,वह भी संदर्भ अलग है ।सर्व प्रथमसेही ब्रह्म शरीराणि वगेरे कहा है ।अब इस अध्यायमे कहते है जो नाश रहित तत्व है वह ब्रह्म है ,और इस भ्रह्मका स्वभाव आध्यात्म कहलाता है ,ब्रह्मकी प्राणी मात्र उत्पन्न करनेकी क्रियाको, कर्म कहते है ,ओर जो नाशवंत है वह अधिभूत कहलाता यह,चैतन्य अधिदेव है, ओर देहधारियों में श्रेष्ठ जो देहमे है वह अधीयज्ञ कहलाता है।
अंतकाल जो भी शरीर जिस भावके साथ देह छोड़ता है वही भाव उसे प्राप्तहोता है। इस कारण निरंतर ईश्वर भावमे रत रहते देह छोड़ते,तब ईश्वर प्राप्त कर सकता है।
ब्रह्मा के दिन और रात सृष्टिके उदय ओर विलयके समय है।वह 1000 युगका है।मगर इससेभी उपरका भाव जो कभी नष्ट नही होता और जहाँ आकर योगी वापस नही जाता वह भाव ,अक्षर कहलाता है ,जो ईश्वर परम पुरुषोत्तमका है। जिस मार्गसे योगी वापस नही आता ।या जहा जीवन मृत्यु चक्र है उसे काल याने समा कहते हैं।
अध्याय 9 राजविद्याराजगुह्य योग नाम दिया है। यहां सबसे महत्वके श्लोक 4 ,जिसमे कहा है कि ईश्वरका अव्यक्त भाव से ही यह सारी सृष्टि है ,और सब भूत, याने सर्व जो होचुका है वह ईश्वरमे है मगर ईश्वर कीसीमे नही।
जयसे बाल कटवाने  बाद  बाल मेरेमे थे अब में उसमे नही।
श्लोक 5 यहाँ प्रथम आत्मा शब्द प्रयोग हुआ जो कहता है भूतोंको उत्पन्न करनेवाला ओर मारने वाला मेरा आत्मा उनमे नही है।
ओर इसी संदर्भ मे अध्याय 10 विभूति योग श्लोक 20 सर्व भूतोंके आशय स्थित मेरा आत्मा स्वरूप में ,उनका आदि मध्य अंत में ही हु। श्लोक 40 41 42 कहता है कि उनकी अनगिनत विभूतिया है अनंत है जो दिव्य प्रकाशमान है वह में हु वहां तक कहा है कि प्रकाश सूर्य चंद्र अग्नि ज्योत सब मेही हु। ओर अन्तमे कहते है कि मेरे एक अंश मात्र से मैने सर्व जगत धारण किया है।
अध्याय 11 विश्वरूप दर्शन जो अर्जुन दिव्य चक्षुके कारण अर्जुन देखता है और डर जाता है।

सिर्फ महसूस हो सकता है।
विश्वरूप दर्शन अर्जुनको दिव्य चक्षु दिए ,फिरभी कहता है ,कि एक साथ हज़ार सूर्यका प्रकाशसेभी ज्यादा तेज था ईश्वरका!! तेज याने भर्ग ,ओर तेजदेने वाला भर्गोदेव ,याने स्वयम ईश्वर ,छंदोमे गायत्री छंद भी वही हैं।यह रूप तत्व दर्शन अनन्य भक्तिसेही महसूस होता है।अनासक्त, सर्व प्राणी पर बैर नही रखनेवाला, ईश्वर परायण ,कर्म निष्काम करनेवाला, ही महसूस कर सकता हैं।
12वा अध्याय भक्ति योग पर है श्लोक 14 से 20 कैसे रहना वह सिखाता है और भक्ति कैसी होनी चाहिए सिखाता है। कर्म फल त्याग पर जोर हैं।
13वा अध्याय क्षेत्र याने शरीर ,खेत्रज्ञ याने ईश्वर ,जो शरीरका ज्ञान है वह ज्ञेय कहलाता है।हमेरे शरीरमे क्या होता है ,यह सिर्फ हमें ही मालूम होता है ।वैद मददगार है।। श्लोक 6 से 19 शरीर के बारेमे है, 6 ओर 7 पंचमहाभूत ,अहंकार ,बुद्धि ,मूल प्रकृति, दस इन्द्रीया, एक मन ,इंद्रियोंके पाँच विषयो ,वगेरे क्षेत्रके बारेमे कहा है। प्रकृति और पुरुष अनादि है, राग ,द्वेष ,सद्गुण ,सब विकार ,प्रकृतिसे उत्पन्न हुए।कार्य कारण के कर्ताका हेतु प्रकृति है और सुख दुख के भोक्ता हेतु पुरुष  जीवात्मा जो आत्मा से जुड़ा है, सबमे है यहां जीवात्मा प्लग सॉकेट द्वारा जैसे बिजली सबमे पहोचती है वैसे।
अध्याय 14 से 18 ज्यादा तर 14 16 17 18 त्रिगुणात्मक बाते है ।और 15 वे अध्याय ,पुरुषोत्तम योग ,श्रुष्टि जटिलता वर्णन ओर अन्तमे कहा है अव्यक्त निर्गुण निराकार एक ही पुरुषोत्तम है। ओर भक्ति वैरागसे मुक्ति।
बाकी ऐरे गेरेको गीता नही सुनानेका। ओर जो भाग्यमे लिखा है वह होगा जो आप प्यारसे स्वीकारोगे तो दुख कम होगा। जय श्री कृष्ण।
मैने जितना समज पाया वह लिखा यह सब मार्कण्डकी सद्गति लिए। हर हर महादेव।

अध्याय 9 श्लोक 20, अध्याय 15 श्लोक 13 ठीक समजो गे सोम पा याने फल वनस्पति खाने वाला होता है।सोम रस याने फलोका रस या आयुर्वेदिक औषधि

सियासी जंग या विकास ?

आप भारतमे कहीभी जाएगे, बहोतसे पुरातत्व अवशेष मिलेंगे,गुफाए ,मंदिर ,देरासर ,जो बहोतसाल सदियो पहले बने है ।हरेक संस्कृति अपनी छाप छोड़ जाती है । कोई बेनमुन है ,कोई युरोपसे आये लोगोने बनायेथे और बने रहे हैं। कोई मोगलों द्वारा बने है ।सबका अपना इतिहास है । वडनगर ,जहाँ मोगलके समय, जब तानसेन दीपक राग गाकर जल रहाथा तब दो नागर बहने, ताना औऱ रिरिने मल्हार गाकर शांत किया था ,और जब अकबरने ताना रीरी को दिल्ही आने कहा और न गई ,तो अकबरने आक्रमण किया और दो बहनोने जल समाधि ली। वडनगर तोरण को ध्वस्त किया ,वडनगरमें कही स्थान पर खुदाई हो रही है और बुद्ध विहार मिल रहे है ।नागरोके इष्ट देव हाटकेश्वर मंदिर बचाथा । वहाँसे आगे 30 किमी पर उमता गाँव है वहां खोदाई करनेके बाद जैन मंदिर और मूर्तिया ,जो मोगलके डरसे छुपाई थी वह निकल रही है ,2000 इसविसन से काम चालू है । मोढेरा सूर्य मंदिर भी भग्न कियाथा उसको गुजरात सरकारने संवारा। सोमनाथ, द्वारिका भी मोगलोके आक्रमण वजहसे नष्ट हुए थे । गुजरातमे मोहनजोदड़ो प्राग ऐतिहासिक है । अमदावाद जुलते मीनार ,सीदी सैयद जाली,गुजरात सरकारने समालि हुई है ।बेनमुन अडालज वाव अमदवादके पास ओर पाटन में रुद्रमहाल ओर रानकदेवी वॉव वह भी पुनरोर्द्धार पर है ।माउंट आबुमे देलवाड़ा जैन दहेरे। एक बात नक्की है कि पुरातत्वमे एकही जगाको बढ़ावा देना और अन्य को नही वह गलत है ।जितने भी मुगल आए उन्होंने अन्य धर्मकी इमारते तोड़ मस्जिदे बनाई है ।मोगल हो या कोई भी हो, मंदिरके बाजुमें मस्जिद हो तो आपसमे तालमेल रख धर्म बजा सकते हो।
वह हकीकत है की उत्तर प्रदेशमे आज ताजके नाम अलग सियासी लड़ाई चल रही है, बाकी भारतमे कहीभी तीर्थ स्थानको डेवलप करना चाहिए। अगर अयोध्या विकास करता है तो किसीको आपत्ति नही होनी चाहिए, गंगा यमुना, सरयू ,नर्मदा ,सिंधु ,कावेरी ,ब्रह्म पुत्रा ,साबरमती,तापी और अन्य छोटी बड़ी नदिया जोड़ कर, केनाल, ऊपर सोलार पेनल, पवन चक्की,बड़े डेमसे हाइड्रोलिक पावर वगेरे हो सकता है, मोदीजी दीर्घ द्रष्टा है,ओर सियासी लड़ाई छोड़ सबने देश विकासके लिए काम करना होगा तो रोजगारी अवसर मिलेंगे।मुंबईमें करीब 8मासमे मेट्रोका काम काफी ऊपर आया है।2000 का गुजरात और आजका गुजरात बहोत विकास हुआ है अन्य राजकी तुलनामे। टेररिस्ट एटेक्से अमेरिकाके ट्विन टावर्स तोड़े ।ओर अभीभी चालू है। नॉर्थ कोरिया और अमेरिका विश्व युद्ध पर उतर आएंगे तो क्या बचेगा । अगर देशका भला चाहते हो तो सियासी लड़ाई मत करो बाकी अल्लाह मालिक, हरि करे सो खरी।

Gitaji in different way

  • I would like to write about Famous verse

Ya Nisha Sarva Bhutanam .

Means that when people pashu pakshi rivers Samudra etc. Are behaving in darkness or to say indifferent way without knowing the Right path or in unenlighten way as it is currently, then at that time, Ruler ,The king would keep restraint and do whatever is right, This is the reason why Modiji do not reply. He keeps restraint.This is Tasyam Jagrati Sanyami.

Yasyam Jagrati bhutani ,when everyone is awake ,doing their work,knowing their Duties and Rights correctly having been enlighten then ,

Sa Nisha Pashyato Munir ,

Then the Ruler without speaking any thing like” Muni’ keep a watch so that there is No danger from outside or inside. This is Pashyato Munir

This was told to Arjun in the battalfield by Lord Krushna as an advise to would-be king

Shrimad Bhagvan Gita My view point in hindi

આજ સુધી હિન્દીમાં ગીતા અધ્યાય મારી સમજ પ્રમાણે લખ્યા ,7, દિવસ તે સંકલિત કરી અત્રે મુકું છું.
Below is my understanding of srimad Bhagavadgita ,written in hindi. Some shlokas interpretation I had shared earlier.
My logical understanding is based on context ,which is Mahabharat Yuddh between Two Kings and their Sena.
Where it is certain that many bodies will loose their lives.
आजसे मारकंदभाई के घरमे श्रीमद भगवद गीताका पाठ होगा ,वैसे हरेक समय सुखदुःखमे गीताजी मार्गदर्शिका है।
पहले ही ,अर्जुनके द्विधापूर्ण वक्तव्यके बाद ही, दूसरे अद्याय से श्रीकृष्ण उपदेश देते है.
आप अपना शरीर, जिस को देहि कहाजाता है ,उसके जीने मरने पर ,पंडित याने ज्ञान निपुण ,शोक नही करते। वैसे देखने जाए तो अपना देह कर्म ही महाभारत युद्ध समान है ,जिसमे 9द्वार, 20 उंगलिया, 2 हाथ ,2 पांव, 32 दांत ,जीभ ,ओर जॉइंट्स ,वगेरे मिलाकर जिससे कर्म कियाजाता है ,यानी कौरव 100 है .अपना छोटा बडा दिमाग ,अंधे याने, गांधारी ,धृतराष्ट्र है ,अपनी पांच इंद्रिया पांडव है ,और छठी इन्द्रिय सूर्यपुत्र सम कर्ण है ।पल पल संग्राम करके, इन्द्रीय ओर उनके विषय के लिए ,कौरव के साथ संग्राम होता है। तो द्वितीय अध्याय सिखाता है।ओर यह देहसे कर्म करना जरूरी है ,कितना भी कष्ट क्यों न आए, गर्मी ठंडी ,सुख दुख, परेशान करते है, मगर जो स्थितप्रज्ञ रहके कर्म करता है ,उसे तकलीफ महसूस नही होती ।और स्थितप्रज्ञ किसे कहते है, वह समजाते है ,और इसके लिए निरंतर अभ्यास याने प्रेक्टिस जरूरी है।स्थित प्रज्ञ ,समाधिस्थ याने हरेक परिस्थितिमे स्थिर रहकर ,सम पर विश्वाससे आधीन रह कर कर्म करे ,उसे समाधिस्थ कहते है। बहोत श्लोक है, जिससे वह, अर्जुन याने देहिमे रहे मन को कैसे तैयार करना ,वह समजाते है ,इसे सांख्य योग नामक अध्याय कहा है।
यह कर्म करने पहले चेतना, याने प्रज्ञा ,वह भी स्थीर धैर्य के साथ ,जरूरी है ।और बाद अध्याय 3में कर्म पर जोर दिया है।
दूसरे अध्यायमे वेदोंको त्रिगुणात्मक कहकर ,मनको गुणातीत करने कहाहय। कर्म करनेके लिए यह भी कहा है ,कि कोई काम करनेकी शरुआत करते, यह काम पूरा होगा या नही वह सोचना ठीक नहीं, कोइनकोयी आगे बढ़ाएंगे।तुमहरे हाथमे सिर्फ कर्तव्य करना है ,उससे लाभ होगा या हानि वह तुमरे हाथमे नही है।मगर कर्मफल हेतु मेरे अभिप्रायसे दुष्फल हेतु रख कर्म न कर और अकर्मी न बन।
जोभी है ,स्थित प्रज्ञ के बारेमे भी विस्तृत बाते कही है, मगर कहीभी आत्माका उल्लेख नही है।
तीसरे अध्यायमे मन बोलता है कि यह सब ज्ञानही लेना है तो मैं कर्म क्यों करू ? तभी श्री कृष्ण कहते है कि ,ज्ञान योगी हो या कर्म योगी ,कोईभी बिना कर्म किए जी नही सकता । कर्म यज्ञ, देवोके लिए करना है, यहाँ पर हम यज्ञको, हवन समजते है ,वह गलत है। सुव्यवस्थित ,विज्ञान नियमानुसार कर्म, वह यज्ञ है अनाज उगाना ,साफ करना ,बेचना ,वह सब यज्ञ है रथ चलाना, हथियार बनाना ,अन्य पशु पालन ,शिक्षण ,यह सब यज्ञ कर्म ही है।हरेक अपनी अपनी वृत्ति ,क्षमता, अनुसार कर्म करता है । रथ चलाना रथी का धर्म है, और घोडेसवारी वह राजा सैनिक वगेरेका धर्म है ,मगर रथी अपना धर्म छोड़ सैनिक बनने जाय वह ,पर धर्म भयावह जयसि बात हुई।
इसमें भी आत्मशब्द ,अपने आप ,याने खुदके लिए है। यहां आत्मस्थ अपनेआपमे स्थिर रहनेके लिए उपयुक्त हुवा है।
श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 2 श्लोक 28 यह श्लोक हम निष्काम भाव और एक साधारण तौर पर देखे तो समजना आसान हो जाएगा यहाँ अर्जुनको भारत कहा है। अव्यक्तादिनी भूतानि यहाँ सिर्फ शरीर ही न समजे जो भी हम भुत याने हुई गई चीज समजले एक बड़ा पत्थर है उसे तोड़कर बाजुमे एक पानीका छोटासा कुण्ड है उसमे डालकर भरदेते है तो पत्थर पत्थर नहीं रहता कुण्ड कुण्ड नहीं। अपनी नई मर्सिडीज़ तैयार होकर आई तो पुर्जे मर्सिडीज होगए बाद एक भयंकर दुर्गतनामे जल गई तो अव्यक्त हो गई ।इसी तरह सर्व शरीर पेड़ पौदे फल फूल सब जब निर्माण होते है तब दीखते है और नष्ट होनेके बाद नहीं। तो ऐसी नाशवंत का शोक क्या करना महेंगा काच नदी परका बाँध वगेरह ।एक बात उनका शोक क्या करना यह बात शब्द प्रयोग परिवेदना है शोक दुःख होना स्वाभाविक है मगर परिवेदना उस वेदना से चिटक रहना योग्य नहीं।गतम् न शोच्यम्।
औरभी बहोत सारी बाते है।
कल मैने मेरी समज अनुसार श्रीमद भगवद्गीता अध्याय 2 की संक्षिप्त बात कहीथी।इस पूरे अध्यायमे शरीर, सत ,असत ,स्थितप्रज्ञ ,वगेरे बातें है।कहीभी आत्मा शब्दका प्रयोग नही हुआ है।श्लोक 12 से 38 तक देहि शरीर सत असत वगेरेकी बात है ।प्रथम अध्याय अर्जुन विषाद योग याने अपने मनका भय कंटाला ।ओर अध्याय 2 श्लोक 11तक काम न करनेकी बहाने बाजी। अध्याय 2 श्लोक 39 प्रथम बार शब्द आत्मस्थ वापरा गया है ,और बाकी कर्मके बारेमे कर्म निस्पृह होकर करने का कहा है।
यज्ञ देवोको प्रसन्न करनेकेलिए, अगर परमेश्वर एक है तो देवोकि बात क्यों? इसलिये की जिस देवोकि बात है, वह पंचदेवसे है ,याने पृथ्वी ,वायु ,जल ,अग्नि, आकाश ,और यह ऋतु चक्रकी बात है। इस बात अध्याय 3 श्लोक 14 15 16 से समज आएगा, श्लोक 17 जो मनुष्य अपने अंतरात्मा से प्रीति तृप्ति संतुष्टि मिलती है उनके कार्यों नही दिखते नविद्यते।
प्रथम मनविषाद दूसरा शरीर और ब्रह्म सत्य, शरीरकी इन्द्रीया उनके विकार क्रिया मन द्वारा नियंत्रण, और तीसरा कर्म ,वह भी यज्ञ है हवन नही।
अब चतुर्थ अध्याय कर्म करो कर्मफल प्रति संयस्थ भावसे। यह भी रोचक है अभी तक कही भी आत्मा परमात्माका उल्लेख नही है। ज्ञानकर्म सन्यास योग 5वा कर्म सन्यास योग और 6 यह सब कर्म आत्मसंयम के साथ करनेकी बात है ।
आज गीताजी अध्याय 5 तक आये हुए कुछ श्लोकों समजनेकी दिशामे प्रयत्न करेंगे।अर्जुन विशाद योग के बाद आए सांख्य योगके ,बारेमें देखेंगे ,सवाल था युद्ध करके मारना ,मरनेका ,वहभी अपनोको ,याने बात शरीर और निजी सबंधोकि है ।श्लोक 16 से 30 तक समजाते हैं कि शरीर ,और परब्रह्म सत ,जिनकी वजहसे शरीर है वह अमर है।31 से आगे व्यवहारिक बात होती है ,कि तेरा क्षत्रिय धर्म स्वभाव ,यह युद्ध जो धर्म युद्ध है तुम्हे करनेको मजबूर करेगा ,अगर तुम नही करेगा तो तुम्हे कायर भगोड़ा कहेगें ,जो ओर कष्टदायी होगा।इस लिए सुख दुःख लाभ अलाभ जय पराजयको सम समज कर, युद्ध कर। श्लोक 40 आगे समजाया था श्लोक 41 व्यावसायिकाणाम एकात्म बुद्धि कर्म रत रहने वाला उसमे मग्न रहता है ,जैसे छोटे बच्चेके हाथमे स्मार्ट फोन! और जो बेकार है उसकी बुद्धि अलग अलग सोचती है ।बिना कामका बेकार। श्लोक64 से इनद्रिय उनके विषय वगेरेकी बात है कैसे काबुमे लेकर काम करना वगेरे है।
यह सब कहनेका मतलब एक ही है कि जन्म बाद जीवन ही महाभारत युद्ध है ओर अध्याय 10 श्लोक 20में प्रथम ही ईश्वर कहते है अहमात्मा गुडाकेश प्राणिनाम।।।।।
हृदयमे हु ओर प्राणियोका आदि मध्य अंत भी में ही हुं।
ज्ञान कर्मसन्यास अपने गुणों के अनुसार करनाही पड़ेगा अंत अध्याय 18 मे कहा है कि आपका गुण ही आपको काम करवाएगा।
आज अध्याय 5 श्लोक 14 15 बारेमे कहता हूं। हमलोग ज्यादातर समजते है कि ईश्वर अपना पाप पुण्यको देखता है ।और कर्म करता कर्म फल वोही कराता हैं।मगर ऐसा है नही हम सब ,मनुष्य ,प्राणी ,पक्षी ,जलचर ,स्थलचर ,उड़ने वाले पंखी ,मच्छर ,माखी ,सभी अपनी प्रकृति अनुसार चलते है ।ईश्वर किसीका पाप और पुण्य अपने पर लेता नही हमे अज्ञानताके कारण ऐसा दिखता है ।हम किसीको निस्वार्थ मदद करते है ,किसीको नोकरी दे मदद करते है ,टेक्स चुराते है, किसीके हकका छिनते है ,तो उसका परिणाम कभी भी हमे भुगतना ही पड़ता है।आप गंदगी करो , ओर मच्छर ड़ेंगूका हो ,तुम्हें कटे ,या किसी औरको ,आपको या उसको किसीको भी डेंगू हो सकता है ।
तो फिर क्या ? तो श्लोक 16 से लेकर बताया है आप पहले ज्ञान प्राप्त करे ,और ज्ञान बुद्धिके ताल मेलसे जाने की क्या सही है ,श्लोक 18 ऐसा विनय युक्त, ब्राह्मण चांडाल हाथी कुत्ते सबमे समान दृष्टि रखते है। यह सब आपको निरंतर अभ्याससे याने Continued Practice से प्राप्त होता है ।हम परीक्षामे पेपर ब्लेंक देंगे ,तो नापास ही होंगे ,सिवाय कोई टीचर पैसे लेकर आपको पेपर लिखवा सके और मार्क मिले अंतिम जो होगा वह आगेकी बात।
अध्याय 6 जो आत्म संयम योग से जाना जाता है उसका प्रथम श्लोक यह कहता है ,कि जो मनुष्य कर्मफल के आश्रयको छोड़ ,अपना कर्म कार्य करे, वह सन्यासीभी है और योगी भी ,मगर जो बिना तेज काम करनेके खातिर काम करे, या निष्क्रिय बैठे, वह नातो सन्यासी है या योगी।
योगमे प्रवेश करनेकी इच्छा रखने वाले को ,अनासक्ति पूर्वक कर्म ,साधन है ,और जो योगारूढ़ होता है, उसका साधन शम, याने धैर्य ,और न्याय विवेक पूर्ण रहना।
श्लोक 4 से लेकर आगे योगिका लक्षण, कैसे योगी होना व लिखा है ,यहां आत्मा शब्द प्रयोग अपने खुदके लिए है ,और जो अंतरात्मा भी होता है ,मगर हम जो आत्मा समजते है ये यह नही है ।आत्मा ही आत्माका शत्रु ओर बंधु होता है ,याने हम अपने आपके शत्रु या बंधु होते है ,हमेरे कर्म अनुसार। ज्यादा सोनेवाला, ज्यादा जगाने वाला ज्यादा भूखा रहने वाला या ज्यादा खाने वाला, योगी नही होसकता।योग भ्रष्ट किसी सच्चे अमीर या ज्ञानिके घर जन्मलेता है ,और योग आगे बढ़ाता है।अन्तमे कहा है
की जो योगी अन्तरात्मासे ईश्वरसे पूर्ण श्रद्धा पूर्वक जुड़ कर ईश्वरको भजता है वह श्रेष्ठ योगी है।
अध्याय 7 ज्ञान विज्ञान योग कहा जाता है।
जिसमे कहा है, कि पृथ्वी ,जल ,वायु ,अग्नि ,आकाश, मन, बुद्धि ,अहंकार याने यूनिक आइडेंटिटी ,वह जीवोंकी अपरा जड़ प्रकृति है ,जब ईश्वरकी चैतन्य जीवरूपी प्रकृति, परा कहलाती है ,जैसे इलेक्ट्रिक करंट कारण जड़ वस्तु अपने अपने गुणानुसारचले जैसे फ्रिज ,पंखा ,हीटर ,लिफ्ट ,व चले।
इलेक्ट्रीसिटी सबमे है, मगर उसमे कोई नही ।वैसेही ईश्वरमे सब है मगर ईश्वर किसमे भी नही। श्लोक 24 25 26 कहते है ईश्वर निर्गुण निराकार अजन्मा अदृश्य है।
अध्याय 8 जिसे अक्षर भ्रह्म योगसे जाना जाता है ।अभी तक आत्मा शब्दका प्रयोग नही हुआ है और जहाँ हुआ है ,वह भी संदर्भ अलग है ।सर्व प्रथमसेही ब्रह्म शरीराणि वगेरे कहा है ।अब इस अध्यायमे कहते है जो नाश रहित तत्व है वह ब्रह्म है ,और इस भ्रह्मका स्वभाव आध्यात्म कहलाता है ,ब्रह्मकी प्राणी मात्र उत्पन्न करनेकी क्रियाको, कर्म कहते है ,ओर जो नाशवंत है वह अधिभूत कहलाता यह,चैतन्य अधिदेव है, ओर देहधारियों में श्रेष्ठ जो देहमे है वह अधीयज्ञ कहलाता है।
अंतकाल जो भी शरीर जिस भावके साथ देह छोड़ता है वही भाव उसे प्राप्तहोता है। इस कारण निरंतर ईश्वर भावमे रत रहते देह छोड़ते,तब ईश्वर प्राप्त कर सकता है।
ब्रह्मा के दिन और रात सृष्टिके उदय ओर विलयके समय है।वह 1000 युगका है।मगर इससेभी उपरका भाव जो कभी नष्ट नही होता और जहाँ आकर योगी वापस नही जाता वह भाव ,अक्षर कहलाता है ,जो ईश्वर परम पुरुषोत्तमका है। जिस मार्गसे योगी वापस नही आता ।या जहा जीवन मृत्यु चक्र है उसे काल याने समा कहते हैं।
अध्याय 9 राजविद्याराजगुह्य योग नाम दिया है। यहां सबसे महत्वके श्लोक 4 ,जिसमे कहा है कि ईश्वरका अव्यक्त भाव से ही यह सारी सृष्टि है ,और सब भूत, याने सर्व जो होचुका है वह ईश्वरमे है मगर ईश्वर कीसीमे नही।
जयसे बाल कटवाने बाद बाल मेरेमे थे अब में उसमे नही।
श्लोक 5 यहाँ प्रथम आत्मा शब्द प्रयोग हुआ जो कहता है भूतोंको उत्पन्न करनेवाला ओर मारने वाला मेरा आत्मा उनमे नही है।
ओर इसी संदर्भ मे अध्याय 10 विभूति योग श्लोक 20 सर्व भूतोंके आशय स्थित मेरा आत्मा स्वरूप में ,उनका आदि मध्य अंत में ही हु। श्लोक 40 41 42 कहता है कि उनकी अनगिनत विभूतिया है अनंत है जो दिव्य प्रकाशमान है वह में हु। ओर अन्तमे कहते है कि मेरे एक अंश मात्र से मैने सर्व जगत धारण किया है।
अध्याय 11 विश्वरूप दर्शन जो अर्जुन दिव्य चक्षुके कारण अर्जुन देखता है और डर जाता है।

सिर्फ महसूस हो सकता है।
विश्वरूप दर्शन अर्जुनको दिव्य चक्षु दिए ,फिरभी कहता है ,कि एक साथ हज़ार सूर्यका प्रकाशसेभी ज्यादा तेज था ईश्वरका!! तेज याने भर्ग ,ओर तेजदेने वाला भर्गोदेव ,याने स्वयम ईश्वर ,छंदोमे गायत्री छंद भी वही हैं।यह रूप तत्व दर्शन अनन्य भक्तिसेही महसूस होता है।अनासक्त, सर्व प्राणी पर बैर नही रखनेवाला, ईश्वर परायण ,कर्म निष्काम करनेवाला, ही महसूस कर सकता हैं।
12वा अध्याय भक्ति योग पर है श्लोक 14 से 20 कैसे रहना वह सिखाता है और भक्ति कैसी होनी चाहिए सिखाता है। कर्म फल त्याग पर जोर हैं।
13वा अध्याय क्षेत्र याने शरीर ,खेत्रज्ञ याने ईश्वर ,जो शरीरका ज्ञान है वह ज्ञेय कहलाता है।हमेरे शरीरमे क्या होता है ,यह सिर्फ हमें ही मालूम होता है ।वैद मददगार है।। श्लोक 6 से 19 शरीर के बारेमे है, 6 ओर 7 पंचमहाभूत ,अहंकार ,बुद्धि ,मूल प्रकृति, दस इन्द्रीया, एक मन ,इंद्रियोंके पाँच विषयो ,वगेरे क्षेत्रके बारेमे कहा है। प्रकृति और पुरुष अनादि है, राग ,द्वेष ,सद्गुण ,सब विकार ,प्रकृतिसे उत्पन्न हुए।कार्य कारण के कर्ताका हेतु प्रकृति है और सुख दुख के भोक्ता हेतु पुरुष जीवात्मा जो आत्मा से जुड़ा है, सबमे है यहां जीवात्मा प्लग सॉकेट द्वारा जैसे बिजली सबमे पहोचती है वैसे।
अध्याय 14 से 18 ज्यादा तर 14 16 17 18 त्रिगुणात्मक बाते है ।और 15 वे अध्याय ,पुरुषोत्तम योग ,श्रुष्टि जटिलता वर्णन। ओर भक्ति वैरागसे मुक्ति।
बाकी ऐरे गेरेको गीता नही सुनानेका। ओर जो भाग्यमे लिखा है वह होगा जो आप प्यारसे स्वीकारोगे तो दुख कम होगा। जय श्री कृष्ण।
मैने जितना समज पाया वह लिखा यह सब मार्कण्डकी सद्गति लिए। हर हर महादेव।

अध्याय 9 श्लोक 20, अध्याय 15 श्लोक 13 ठीक समजो गे सोम पा याने फल वनस्पति खाने वाला होता है।सोम रस याने फलोका रस या आयुर्वेदिक औषधि

Shrimad Bhagavad-Gita My personal view in Hindi

આજ સુધી હિન્દીમાં ગીતા અધ્યાય મારી સમજ પ્રમાણે લખ્યા ,7, દિવસ તે સંકલિત કરી અત્રે મુકું છું.
Below is my understanding of srimad Bhagavadgita ,written in hindi. Some shlokas interpretation I had shared earlier.
My logical understanding is based on context ,which is Mahabharat Yuddh between Two Kings and their Sena.
Where it is certain that many bodies will loose their lives.
आजसे मारकंदभाई के घरमे श्रीमद भगवद गीताका पाठ होगा ,वैसे हरेक समय सुखदुःखमे गीताजी मार्गदर्शिका है।
पहले ही ,अर्जुनके द्विधापूर्ण वक्तव्यके बाद ही, दूसरे अद्याय से श्रीकृष्ण उपदेश देते है.
आप अपना शरीर, जिस को देहि कहाजाता है ,उसके जीने मरने पर ,पंडित याने ज्ञान निपुण ,शोक नही करते। वैसे देखने जाए तो अपना देह कर्म ही महाभारत युद्ध समान है ,जिसमे 9द्वार, 20 उंगलिया, 2 हाथ ,2 पांव, 32 दांत ,जीभ ,ओर जॉइंट्स ,वगेरे मिलाकर जिससे कर्म कियाजाता है ,यानी कौरव 100 है .अपना छोटा बडा दिमाग ,अंधे याने, गांधारी ,धृतराष्ट्र है ,अपनी पांच इंद्रिया पांडव है ,और छठी इन्द्रिय सूर्यपुत्र सम कर्ण है ।पल पल संग्राम करके, इन्द्रीय ओर उनके विषय के लिए ,कौरव के साथ संग्राम होता है। तो द्वितीय अध्याय सिखाता है।ओर यह देहसे कर्म करना जरूरी है ,कितना भी कष्ट क्यों न आए, गर्मी ठंडी ,सुख दुख, परेशान करते है, मगर जो स्थितप्रज्ञ रहके कर्म करता है ,उसे तकलीफ महसूस नही होती ।और स्थितप्रज्ञ किसे कहते है, वह समजाते है ,और इसके लिए निरंतर अभ्यास याने प्रेक्टिस जरूरी है।स्थित प्रज्ञ ,समाधिस्थ याने हरेक परिस्थितिमे स्थिर रहकर ,सम पर विश्वाससे आधीन रह कर कर्म करे ,उसे समाधिस्थ कहते है। बहोत श्लोक है, जिससे वह, अर्जुन याने देहिमे रहे मन को कैसे तैयार करना ,वह समजाते है ,इसे सांख्य योग नामक अध्याय कहा है।
यह कर्म करने पहले चेतना, याने प्रज्ञा ,वह भी स्थीर धैर्य के साथ ,जरूरी है ।और बाद अध्याय 3में कर्म पर जोर दिया है।
दूसरे अध्यायमे वेदोंको त्रिगुणात्मक कहकर ,मनको गुणातीत करने कहाहय। कर्म करनेके लिए यह भी कहा है ,कि कोई काम करनेकी शरुआत करते, यह काम पूरा होगा या नही वह सोचना ठीक नहीं, कोइनकोयी आगे बढ़ाएंगे।तुमहरे हाथमे सिर्फ कर्तव्य करना है ,उससे लाभ होगा या हानि वह तुमरे हाथमे नही है।मगर कर्मफल हेतु मेरे अभिप्रायसे दुष्फल हेतु रख कर्म न कर और अकर्मी न बन।
जोभी है ,स्थित प्रज्ञ के बारेमे भी विस्तृत बाते कही है, मगर कहीभी आत्माका उल्लेख नही है।
तीसरे अध्यायमे मन बोलता है कि यह सब ज्ञानही लेना है तो मैं कर्म क्यों करू ? तभी श्री कृष्ण कहते है कि ,ज्ञान योगी हो या कर्म योगी ,कोईभी बिना कर्म किए जी नही सकता । कर्म यज्ञ, देवोके लिए करना है, यहाँ पर हम यज्ञको, हवन समजते है ,वह गलत है। सुव्यवस्थित ,विज्ञान नियमानुसार कर्म, वह यज्ञ है अनाज उगाना ,साफ करना ,बेचना ,वह सब यज्ञ है रथ चलाना, हथियार बनाना ,अन्य पशु पालन ,शिक्षण ,यह सब यज्ञ कर्म ही है।हरेक अपनी अपनी वृत्ति ,क्षमता, अनुसार कर्म करता है । रथ चलाना रथी का धर्म है, और घोडेसवारी वह राजा सैनिक वगेरेका धर्म है ,मगर रथी अपना धर्म छोड़ सैनिक बनने जाय वह ,पर धर्म भयावह जयसि बात हुई।
इसमें भी आत्मशब्द ,अपने आप ,याने खुदके लिए है। यहां आत्मस्थ अपनेआपमे स्थिर रहनेके लिए उपयुक्त हुवा है।
श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 2 श्लोक 28 यह श्लोक हम निष्काम भाव और एक साधारण तौर पर देखे तो समजना आसान हो जाएगा यहाँ अर्जुनको भारत कहा है। अव्यक्तादिनी भूतानि यहाँ सिर्फ शरीर ही न समजे जो भी हम भुत याने हुई गई चीज समजले एक बड़ा पत्थर है उसे तोड़कर बाजुमे एक पानीका छोटासा कुण्ड है उसमे डालकर भरदेते है तो पत्थर पत्थर नहीं रहता कुण्ड कुण्ड नहीं। अपनी नई मर्सिडीज़ तैयार होकर आई तो पुर्जे मर्सिडीज होगए बाद एक भयंकर दुर्गतनामे जल गई तो अव्यक्त हो गई ।इसी तरह सर्व शरीर पेड़ पौदे फल फूल सब जब निर्माण होते है तब दीखते है और नष्ट होनेके बाद नहीं। तो ऐसी नाशवंत का शोक क्या करना महेंगा काच नदी परका बाँध वगेरह ।एक बात उनका शोक क्या करना यह बात शब्द प्रयोग परिवेदना है शोक दुःख होना स्वाभाविक है मगर परिवेदना उस वेदना से चिटक रहना योग्य नहीं।गतम् न शोच्यम्।
औरभी बहोत सारी बाते है।
कल मैने मेरी समज अनुसार श्रीमद भगवद्गीता अध्याय 2 की संक्षिप्त बात कहीथी।इस पूरे अध्यायमे शरीर, सत ,असत ,स्थितप्रज्ञ ,वगेरे बातें है।कहीभी आत्मा शब्दका प्रयोग नही हुआ है।श्लोक 12 से 38 तक देहि शरीर सत असत वगेरेकी बात है ।प्रथम अध्याय अर्जुन विषाद योग याने अपने मनका भय कंटाला ।ओर अध्याय 2 श्लोक 11तक काम न करनेकी बहाने बाजी। अध्याय 2 श्लोक 39 प्रथम बार शब्द आत्मस्थ वापरा गया है ,और बाकी कर्मके बारेमे कर्म निस्पृह होकर करने का कहा है।
यज्ञ देवोको प्रसन्न करनेकेलिए, अगर परमेश्वर एक है तो देवोकि बात क्यों? इसलिये की जिस देवोकि बात है, वह पंचदेवसे है ,याने पृथ्वी ,वायु ,जल ,अग्नि, आकाश ,और यह ऋतु चक्रकी बात है। इस बात अध्याय 3 श्लोक 14 15 16 से समज आएगा, श्लोक 17 जो मनुष्य अपने अंतरात्मा से प्रीति तृप्ति संतुष्टि मिलती है उनके कार्यों नही दिखते नविद्यते।
प्रथम मनविषाद दूसरा शरीर और ब्रह्म सत्य, शरीरकी इन्द्रीया उनके विकार क्रिया मन द्वारा नियंत्रण, और तीसरा कर्म ,वह भी यज्ञ है हवन नही।
अब चतुर्थ अध्याय कर्म करो कर्मफल प्रति संयस्थ भावसे। यह भी रोचक है अभी तक कही भी आत्मा परमात्माका उल्लेख नही है। ज्ञानकर्म सन्यास योग 5वा कर्म सन्यास योग और 6 यह सब कर्म आत्मसंयम के साथ करनेकी बात है ।
आज गीताजी अध्याय 5 तक आये हुए कुछ श्लोकों समजनेकी दिशामे प्रयत्न करेंगे।अर्जुन विशाद योग के बाद आए सांख्य योगके ,बारेमें देखेंगे ,सवाल था युद्ध करके मारना ,मरनेका ,वहभी अपनोको ,याने बात शरीर और निजी सबंधोकि है ।श्लोक 16 से 30 तक समजाते हैं कि शरीर ,और परब्रह्म सत ,जिनकी वजहसे शरीर है वह अमर है।31 से आगे व्यवहारिक बात होती है ,कि तेरा क्षत्रिय धर्म स्वभाव ,यह युद्ध जो धर्म युद्ध है तुम्हे करनेको मजबूर करेगा ,अगर तुम नही करेगा तो तुम्हे कायर भगोड़ा कहेगें ,जो ओर कष्टदायी होगा।इस लिए सुख दुःख लाभ अलाभ जय पराजयको सम समज कर, युद्ध कर। श्लोक 40 आगे समजाया था श्लोक 41 व्यावसायिकाणाम एकात्म बुद्धि कर्म रत रहने वाला उसमे मग्न रहता है ,जैसे छोटे बच्चेके हाथमे स्मार्ट फोन! और जो बेकार है उसकी बुद्धि अलग अलग सोचती है ।बिना कामका बेकार। श्लोक64 से इनद्रिय उनके विषय वगेरेकी बात है कैसे काबुमे लेकर काम करना वगेरे है।
यह सब कहनेका मतलब एक ही है कि जन्म बाद जीवन ही महाभारत युद्ध है ओर अध्याय 10 श्लोक 20में प्रथम ही ईश्वर कहते है अहमात्मा गुडाकेश प्राणिनाम।।।।।
हृदयमे हु ओर प्राणियोका आदि मध्य अंत भी में ही हुं।
ज्ञान कर्मसन्यास अपने गुणों के अनुसार करनाही पड़ेगा अंत अध्याय 18 मे कहा है कि आपका गुण ही आपको काम करवाएगा।
आज अध्याय 5 श्लोक 14 15 बारेमे कहता हूं। हमलोग ज्यादातर समजते है कि ईश्वर अपना पाप पुण्यको देखता है ।और कर्म करता कर्म फल वोही कराता हैं।मगर ऐसा है नही हम सब ,मनुष्य ,प्राणी ,पक्षी ,जलचर ,स्थलचर ,उड़ने वाले पंखी ,मच्छर ,माखी ,सभी अपनी प्रकृति अनुसार चलते है ।ईश्वर किसीका पाप और पुण्य अपने पर लेता नही हमे अज्ञानताके कारण ऐसा दिखता है ।हम किसीको निस्वार्थ मदद करते है ,किसीको नोकरी दे मदद करते है ,टेक्स चुराते है, किसीके हकका छिनते है ,तो उसका परिणाम कभी भी हमे भुगतना ही पड़ता है।आप गंदगी करो , ओर मच्छर ड़ेंगूका हो ,तुम्हें कटे ,या किसी औरको ,आपको या उसको किसीको भी डेंगू हो सकता है ।
तो फिर क्या ? तो श्लोक 16 से लेकर बताया है आप पहले ज्ञान प्राप्त करे ,और ज्ञान बुद्धिके ताल मेलसे जाने की क्या सही है ,श्लोक 18 ऐसा विनय युक्त, ब्राह्मण चांडाल हाथी कुत्ते सबमे समान दृष्टि रखते है। यह सब आपको निरंतर अभ्याससे याने Continued Practice से प्राप्त होता है ।हम परीक्षामे पेपर ब्लेंक देंगे ,तो नापास ही होंगे ,सिवाय कोई टीचर पैसे लेकर आपको पेपर लिखवा सके और मार्क मिले अंतिम जो होगा वह आगेकी बात।
अध्याय 6 जो आत्म संयम योग से जाना जाता है उसका प्रथम श्लोक यह कहता है ,कि जो मनुष्य कर्मफल के आश्रयको छोड़ ,अपना कर्म कार्य करे, वह सन्यासीभी है और योगी भी ,मगर जो बिना तेज काम करनेके खातिर काम करे, या निष्क्रिय बैठे, वह नातो सन्यासी है या योगी।
योगमे प्रवेश करनेकी इच्छा रखने वाले को ,अनासक्ति पूर्वक कर्म ,साधन है ,और जो योगारूढ़ होता है, उसका साधन शम, याने धैर्य ,और न्याय विवेक पूर्ण रहना।
श्लोक 4 से लेकर आगे योगिका लक्षण, कैसे योगी होना व लिखा है ,यहां आत्मा शब्द प्रयोग अपने खुदके लिए है ,और जो अंतरात्मा भी होता है ,मगर हम जो आत्मा समजते है ये यह नही है ।आत्मा ही आत्माका शत्रु ओर बंधु होता है ,याने हम अपने आपके शत्रु या बंधु होते है ,हमेरे कर्म अनुसार। ज्यादा सोनेवाला, ज्यादा जगाने वाला ज्यादा भूखा रहने वाला या ज्यादा खाने वाला, योगी नही होसकता।योग भ्रष्ट किसी सच्चे अमीर या ज्ञानिके घर जन्मलेता है ,और योग आगे बढ़ाता है।अन्तमे कहा है
की जो योगी अन्तरात्मासे ईश्वरसे पूर्ण श्रद्धा पूर्वक जुड़ कर ईश्वरको भजता है वह श्रेष्ठ योगी है।
अध्याय 7 ज्ञान विज्ञान योग कहा जाता है।
जिसमे कहा है, कि पृथ्वी ,जल ,वायु ,अग्नि ,आकाश, मन, बुद्धि ,अहंकार याने यूनिक आइडेंटिटी ,वह जीवोंकी अपरा जड़ प्रकृति है ,जब ईश्वरकी चैतन्य जीवरूपी प्रकृति, परा कहलाती है ,जैसे इलेक्ट्रिक करंट कारण जड़ वस्तु अपने अपने गुणानुसारचले जैसे फ्रिज ,पंखा ,हीटर ,लिफ्ट ,व चले।
इलेक्ट्रीसिटी सबमे है, मगर उसमे कोई नही ।वैसेही ईश्वरमे सब है मगर ईश्वर किसमे भी नही। श्लोक 24 25 26 कहते है ईश्वर निर्गुण निराकार अजन्मा अदृश्य है।
अध्याय 8 जिसे अक्षर भ्रह्म योगसे जाना जाता है ।अभी तक आत्मा शब्दका प्रयोग नही हुआ है और जहाँ हुआ है ,वह भी संदर्भ अलग है ।सर्व प्रथमसेही ब्रह्म शरीराणि वगेरे कहा है ।अब इस अध्यायमे कहते है जो नाश रहित तत्व है वह ब्रह्म है ,और इस भ्रह्मका स्वभाव आध्यात्म कहलाता है ,ब्रह्मकी प्राणी मात्र उत्पन्न करनेकी क्रियाको, कर्म कहते है ,ओर जो नाशवंत है वह अधिभूत कहलाता यह,चैतन्य अधिदेव है, ओर देहधारियों में श्रेष्ठ जो देहमे है वह अधीयज्ञ कहलाता है।
अंतकाल जो भी शरीर जिस भावके साथ देह छोड़ता है वही भाव उसे प्राप्तहोता है। इस कारण निरंतर ईश्वर भावमे रत रहते देह छोड़ते,तब ईश्वर प्राप्त कर सकता है।
ब्रह्मा के दिन और रात सृष्टिके उदय ओर विलयके समय है।वह 1000 युगका है।मगर इससेभी उपरका भाव जो कभी नष्ट नही होता और जहाँ आकर योगी वापस नही जाता वह भाव ,अक्षर कहलाता है ,जो ईश्वर परम पुरुषोत्तमका है। जिस मार्गसे योगी वापस नही आता ।या जहा जीवन मृत्यु चक्र है उसे काल याने समा कहते हैं।
अध्याय 9 राजविद्याराजगुह्य योग नाम दिया है। यहां सबसे महत्वके श्लोक 4 ,जिसमे कहा है कि ईश्वरका अव्यक्त भाव से ही यह सारी सृष्टि है ,और सब भूत, याने सर्व जो होचुका है वह ईश्वरमे है मगर ईश्वर कीसीमे नही।
जयसे बाल कटवाने बाद बाल मेरेमे थे अब में उसमे नही।
श्लोक 5 यहाँ प्रथम आत्मा शब्द प्रयोग हुआ जो कहता है भूतोंको उत्पन्न करनेवाला ओर मारने वाला मेरा आत्मा उनमे नही है।
ओर इसी संदर्भ मे अध्याय 10 विभूति योग श्लोक 20 सर्व भूतोंके आशय स्थित मेरा आत्मा स्वरूप में ,उनका आदि मध्य अंत में ही हु। श्लोक 40 41 42 कहता है कि उनकी अनगिनत विभूतिया है अनंत है जो दिव्य प्रकाशमान है वह में हु। ओर अन्तमे कहते है कि मेरे एक अंश मात्र से मैने सर्व जगत धारण किया है।
अध्याय 11 विश्वरूप दर्शन जो अर्जुन दिव्य चक्षुके कारण अर्जुन देखता है और डर जाता है।

सिर्फ महसूस हो सकता है।
विश्वरूप दर्शन अर्जुनको दिव्य चक्षु दिए ,फिरभी कहता है ,कि एक साथ हज़ार सूर्यका प्रकाशसेभी ज्यादा तेज था ईश्वरका!! तेज याने भर्ग ,ओर तेजदेने वाला भर्गोदेव ,याने स्वयम ईश्वर ,छंदोमे गायत्री छंद भी वही हैं।यह रूप तत्व दर्शन अनन्य भक्तिसेही महसूस होता है।अनासक्त, सर्व प्राणी पर बैर नही रखनेवाला, ईश्वर परायण ,कर्म निष्काम करनेवाला, ही महसूस कर सकता हैं।
12वा अध्याय भक्ति योग पर है श्लोक 14 से 20 कैसे रहना वह सिखाता है और भक्ति कैसी होनी चाहिए सिखाता है। कर्म फल त्याग पर जोर हैं।
13वा अध्याय क्षेत्र याने शरीर ,खेत्रज्ञ याने ईश्वर ,जो शरीरका ज्ञान है वह ज्ञेय कहलाता है।हमेरे शरीरमे क्या होता है ,यह सिर्फ हमें ही मालूम होता है ।वैद मददगार है।। श्लोक 6 से 19 शरीर के बारेमे है, 6 ओर 7 पंचमहाभूत ,अहंकार ,बुद्धि ,मूल प्रकृति, दस इन्द्रीया, एक मन ,इंद्रियोंके पाँच विषयो ,वगेरे क्षेत्रके बारेमे कहा है। प्रकृति और पुरुष अनादि है, राग ,द्वेष ,सद्गुण ,सब विकार ,प्रकृतिसे उत्पन्न हुए।कार्य कारण के कर्ताका हेतु प्रकृति है और सुख दुख के भोक्ता हेतु पुरुष जीवात्मा जो आत्मा से जुड़ा है, सबमे है यहां जीवात्मा प्लग सॉकेट द्वारा जैसे बिजली सबमे पहोचती है वैसे।
अध्याय 14 से 18 ज्यादा तर 14 16 17 18 त्रिगुणात्मक बाते है ।और 15 वे अध्याय ,पुरुषोत्तम योग ,श्रुष्टि जटिलता वर्णन। ओर भक्ति वैरागसे मुक्ति।
बाकी ऐरे गेरेको गीता नही सुनानेका। ओर जो भाग्यमे लिखा है वह होगा जो आप प्यारसे स्वीकारोगे तो दुख कम होगा। जय श्री कृष्ण।
मैने जितना समज पाया वह लिखा यह सब मार्कण्डकी सद्गति लिए। हर हर महादेव।

अध्याय 9 श्लोक 20, अध्याय 15 श्लोक 13 ठीक समजो गे सोम पा याने फल वनस्पति खाने वाला होता है।सोम रस याने फलोका रस या आयुर्वेदिक औषधि

માતૃભાષા કે અંગ્રેજી માધ્યમ

ચર્ચા અને ખર્ચા અનંત બાળકોને ખાસ ભારતના શિક્ષણ માટે માધ્યમ કયું રાખવું આ પ્રશ્ન સહુથી વધુ !! કારણ આપણે અંગ્રેજોની ગુલામીમાં જીવ્યા આપણા હાલના સિનેમા ટીવી ચેનલ વગેરેમાં એની છાંટ વધારે વર્તાય છે.ભારતની રાષ્ટ્ર ભાષા હિન્દી છે અને હિન્દી સિનેમાની વ્યાપકતા કારણે સ્કુલ કોલેજમાં ભણતાં બાળકો તેમની માતૃભાષા છોડી હિંગ્લીશમાં વાતો કરે ક્યારે તેમના ઘરની બોલચાલનો લહેજો આવી જાય આઈગ હાય લા અચ્છા હવે જાને વગેરે.તમે લંડન અમેરિકા જાઓ તો ત્યાંના અંગ્રેજી બોલચાલમાં હાથી ઘોડાનો ફરક છે .આપણા ઘણા જે ત્યાં સ્થાઈ થાયછે કે થયા છે તેમની બોલ ચાલમાં જે તે દેશના જે તે ગામના છે એ ભાષાનો લહેજો છે . આ ધોરીયા હાલા યુઝલેહ મેનર્સ પણ બુદ્ધિના બુતથા. અત્રે દક્ષિણમાં કે બંગાળ ઓરિસસ્સા તમારું હિન્દી અંગ્રેજી કાંઈ કામ ન આવે .ફ્રાન્સ જર્મની બીજી યુરોપ જગા રશિયા ચીન જાપાન ભાગ્યેજ અંગ્રેજી બોલે સમજે. આપણા મોદીજી ઘણું કરીને હિન્દીમાં બોલે છે અને તે સમયે યુ એન માં અન્ય ભાષમાં ભાષાંતર થાય છે.આપણામાં જે આછકલા છે તેમને બાળકોને અંગ્રેજી ભણાવવાના ધખારા છે. આ આપણા ગુજરાતીઓને લાગુ પડે છે.

આપણે ગુજરાતીઓ ક્યારે સમજશું?

 

મનો કલ્પિત

આજના આધુનિક સમયમાં મને કઈ વિચિત્ર વિચાર આવ્યો . ચાલો આટલુ મોટું મુંબઇ શહેર છે .ઊંચા ઊંચા ઘીચ મકાનો ,માણસો ,મોલ ,રેકડીઓ, અવાજ ગંદગી ફૂલો મંદિરમાં ચઢાવવા કે કોઈ લગ્ન પાર્ટી વગેરેમાં કોઈવાર મૃત શરીર પર કે કોઈ સત્તા ભૂખ્યા નેતાના ગળે…

હું મારી એસી ગાડી લઇ નીકળી પડ્યો કોઈ એવી જગા જે શહેરથી નજીકમાં હોય અને શહેર દેખાય પણ નહિ .શિયાળો ઉતરવાની વાર હતી વસંત આવવાના એંધાણ સમ આરે કોલોની બાગમાં ફુલ દેખતાં હતાં. મેં સ્પેશિયલ પરવાનગી લઇ ફિલ્મસિટીના રસ્તે કેનેરી કેવઝ ગાડી લીધી. રાતના કોઈને જાવા નદે. મેં હિંમત કરી પરમિશન દેખાડી. ગાડી પાર્ક કરી ચાવી કેનેરી ગુફાના રક્ષકને આપી અંદર ગયો.લગભગ કલાક થયો હશે સુરજ આથમ્યો. અને પૂનમની ચાંદની થઇ .હવે ગુફાઓ પુરી થઇ જંગલ શરુ થયું .જંગલ આગળ ચાલતાં વધુ ઘીચ થવા માંડ્યું, મેં મારા મોબાઈલ જીપીએસ ચાલુ કર્યું અને મારી નવાઈ વચ્ચે મારાથી 2 કિલોમીટર દૂર કોઈ વસાહત દેખાડતું સિગ્નલ આવ્યું. મને એમ કે કોઈ સરકારી વસાહત હશે .હું આગળ ચાલ્યો પણ રસ્તો ક્યાં પણ દેખાતો નહોતો. એટલામાં મારા મોબાઈલ પર મેસેજ આવ્યો સાવધાન તમે આરક્ષિત જગાએ છો .મેં જવાબ આપ્યો મને ખબર નથી . ફોન પર ઉભા રહો અને લાલ સિગ્નલ ચાલુ થયું ફોન ડેડ થઇ ગયો .

પાંચ સાત મિનિટ ઉભો ત્યાં એક તેજ વાસ આવી, હું બેભાન થઇ ગયો. જાગ્યો ત્યારે સવાર પાડવા આવી હતી ભોં ભાખલું અજવાળું હતું ક્ષિતિજ પર બુધ દેખાતો હતો.બાજુના ઝુંપડા ઝૂંપડું ન કહેવાય કારણ એક પુષ્પ કુટિર હતી ,સુંદર અવાજમાં એક સ્ત્રી રાગ ભુપાલીમાં સંસ્કૃત ગીત ગાતી હતી .હું મંત્ર મુગ્ધ થઇ ગયો.એટલામાં પહેલું સૂર્યકિરણ દેખાયું. અને ચાર પાંચ યુવતીઓ ફટા ફટ કાંઈ કામ કરવા લાગી. એક સુંદર યુવતી ફૂલોની ટેકરી લઇ મારી પાસે આવી અને અંગ્રેજી ભાષામાં બોલી કે તમારે ફ્રેશ થવું છે !? મેં કહ્યું હા અને મને એક દૂર જગા બતાવી હું ગયો. મારા અચરજ વચ્ચે ત્યાં એક ધોધ હતો તેનું શુદ્ધ પાણી સવારના તાજા ખીલેલાં ફુલ પર થઇ વોશ બેસિન જે સિરામિકનું હતું તેમાં પડતું હતું બાજુમાં કાપેલું લીંબુ અને મીઠાના ગાંગડા અને દાતણની ચીરી હતી અને મગમાં ગુલાબ જળ હતું .બાજુમાં લેટેસ્ટ ટોયલેટ હતું હું ફ્રેશ થઇ નહાવા ગયો તો સામે ધોધ હતો તેની વચ્ચે આવી ગયો અને દરવાજા બહાર ધોધના સૂર્યમુખી ફુલ સુગંધિત પાણીથી નાહ્યો.

 

 

 

 

મનો કલ્પિત આગળ

નહાઈને બહાર નીકળ્યો ત્યારે ચેંજ કરવા પિતામ્બર જનોઈ ખેસ રેશમી હતા ! હું તૈયાર થઇ બહાર નીકળ્યો તો એક ગુલાબ પાંખડીઓની પગ દંડી અને ખિલેલાં ગુલાબ મોઘરાના ફૂલથી મહેકતો બાગ એક પરિચારિકા આવી અને ઇશારાથી આગળ જાવા કીધું જઈને જોઉં તો 11 સુંદર યુવતીઓ ફૂલોથી સજાએલી વેદ પાઠ કરતી હતી ચારે બાજુ ફૂલોની રંગોળી હતી. મને બેસવા કહ્યું હું બેઠો આંખો મીંચી અને આ સંસ્કૃત વેદોચ્ચાર અને તેના અર્થ દ્રશ્ય શ્રાવ્ય થયા , હું અચરજ પામ્યો.

થોડા સમય પછી યુવતીઓની હેડ મારી પાસે આવી અને પૂછ્યું .why have you come here ? I didnot know i was wandering i replied. She told જુઓ તમે જે હો તે આ જગ્યા દિવ્ય છે અને આ ગુફાઓ બની તે પહેલાંની છે .કોઈ પણ જાણતું નથી અને જાણી શકશે પણ નહિ. હું બોલ્યો ભલે પણ તમે મને આ વેશ કેમ પહેરાવ્યો છે ?!  જવાબમાં તે હસી અને અંધકાર થઇ ગયો ,હું એકદમ વજન વિહોણો થઇ ગયો ધીમે ધીમે હું પાછળ ગતિ કરવા લાગ્યો બાળપણ હું જનમ્યો અને મારી મમ્મીને મરતા જોઈ પપ્પા જોરથી રડતા હતા.ત્યાં હું મમ્મીના પેટમાં લાત મારતો અને મારા મમ્મી પપ્પા ખુબ રાજી થતા જોયું તે પહેલાના જન્મો કર્મો મર્મો દેખાતા ગયા અને જે યુગમાં આ જગા હતી તે દેખાણી અને હું એક સુંદર યુવતીને પરણવા તૈયાર થતો દેખાયો અને પ્રકાશ થયો અમે બધા સંસ્કૃતમાં વાતો કરવા લાગ્યા .સરસ મઝાના ડુંગરની તળેટીમાં એક સામ્રાજ્ય હતું અને હું તેનો રાજ કુંવર. એટલામાં રાજા લશ્કર લઇ આવ્યા અને અમારા લગ્ન રોકવા પ્રયત્ન કરવા માંડયા લડાઈ થઇ બહુ ખુવારી હું અને મારી પ્રેમિકા ગાંધર્વ લગ્ન કર્યા. અને અચાનક બધું ગાયબ થઇ ગયું.હું હોસ્ટેલ બહાર જાગ્યો ગભરાઈ ગયો યાદ આવ્યું હું અને મારી પ્રેમિકા ભાગીને લગ્ન કરવાનો નિર્ણય કરી છુટા પડયા તેનો બાપ રાજકારણી પૈસા વાળો અમને લગ્ન નહિ કરવા દે. મને થયું આ કેટલા જન્મો થયા માણસ કેમ બદલાયો નહિ ?!